जिनवाणी-श्रवण-विवेक...

आप आज जिनवाणी सुनने आए हैं... आपको लाख-लाख धन्यवाद!
आप जिनवाणी-श्रवण इस प्रकार से करें कि आपको जिनवाणी सुनने का सुयोग सदा मिलता रहे, भवान्तर में भी मिले... और आपको सुनना प्रिय भी लगे... है न?
इसके लिए तीन बातों का ध्यान रखना है 🡺
1. दूसरों के जिनवाणी-श्रवण में अंतराय उत्पन्न न करें।
न बातें करें... न कुर्सी खिसकाने की आवाज़ करें... न मोबाइल की घंटी बजने दें...
न वाहन का हॉर्न बजाएँ...
हमारी वजह से हुई ध्वनि से, दूसरों के जिनवाणी-श्रवण में अंतराय होगा... और तब भविष्य में हमें भी
जिनवाणी-श्रवण में अंतराय का सामना करना पड़ेगा...
इतनी समझ तो हम सब में है ही, है न?
2. ‘व्याख्यान’ नामक कार्यक्रम के प्रति ही किसी को अरुचि न हो, इसका ध्यान रखें।
या तो वाहन लाएँ ही नहीं... या उसे इस प्रकार पार्क करें कि किसी को कोई बाधा न हो...
अनुचित प्रवृत्ति से यदि हमने दूसरों में व्याख्यान के प्रति अरुचि उत्पन्न की, तो भविष्य में हमें भी
व्याख्यान के प्रति अरुचि हो, ऐसा कर्म अवश्य बंधेगा...
इतना ज्ञान तो हमें है ही!
3. स्थान होते हुए भी किसी को लौटना न पड़े या ठीक से सुनाई न दे, ऐसा न हो, इसका ध्यान रखें...
यदि हम बीच में अतिरिक्त जगह छोड़ेंगे, तो 🡺
❖ उपाश्रय भर जाने के कारण, व्याख्यान सुनने आए किसी आराधक को वापस जाना पड़ सकता है...
❖ पीछे बैठे आराधकों के बहुत दूर हो जाने से उन्हें व्याख्यान ठीक से सुनाई नहीं देगा...
❖ व्याख्यान रोककर महात्माजी या कार्यकर्ता को सबसे आगे आने का निवेदन करना पड़ता है, जिससे
व्याख्यान का समय चार-पाँच मिनट कम हो जाता है...
इन सबसे भी हमें अंतराय कर्म का बंध होगा... हम सुनना चाहेंगे, तो जगह नहीं मिलेगी... दूर बैठने के
कारण सुनाई नहीं देगा... चलते व्याख्यान में कोई विक्षेप आएगा...
इन सबसे बचने के लिए, अतिरिक्त जगह छोड़े बिना एक-दूसरे से सटकर बैठें।
मुंबई जैसे शहरों में, एक स्क्वेर फुट जगह की कीमत २५,००० से ५०,००० रु. होती है... जगह बर्बाद करने वाला, संघ की उतनी संपत्ति नष्ट कर रहा है...
हमें प्राप्त हुई वस्तुओं में सबसे मूल्यवान वस्तु जिनवाणी है...
क्योंकि मरण के समय समाधि, परभव में सद्गति और परंपरा से परमगति...
ये तीनों देने की शक्ति केवल जिनवाणी में ही है।
यह वस्तु हमसे छिन न जाए, इसके लिए... अपने हित के लिए ही... हमें बस इतना ही करना है।
No Noise… No Parking Issues… No Waste of Space
याद रहेगा न?
Article written by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.

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