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स्वसमयप्रज्ञापक...
Download PDF આ લેખ આપ ગુજરાતીમાં પણ વાંચી શકો છો उपदेश पदमां, आज्ञायोग पर अत्यंत भार मूक्यो छे. बधा ज उपदेशमां अंते ‘आज्ञायोग ज सारभूत छे’ – तेवुं पुनः पुनः प्रतिपादन कर्युं छे. ए आज्ञायोग जाणवानो कोनी पासे ? तो जणाव्युं छे – गीतार्थ गुरु पासे. ए गुरु केवा होवा जोइए ? तेना उत्तरमां घणा विशेषणो जणाव्या छे, तेमां एक छे – स्वसमयप्रज्ञापक. ए विशेषण पर केटलीक विचारणा प्रस्तुत छे. शुं एनो अर्थ ए थाय, के गुरु परसमयनी प्रज्ञापना न ज करे ? एवो तो न ज करी शकाय, कारणके स्वसमयनी सिद्धि म
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