दान–विवेक ?...
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पर्युषण नज़दीक है... वार्षिक खर्च की पूर्ति के लिए पर्युषण में फंड होंगे। उदार दिलवाले श्रेष्ठीवर्य खुले हाथ से संपत्ति का दान करेंगे। यदि आप दान के फल को गुणित करना चाहते हैं, तो इतना ध्यान रखने योग्य है -->
व्याख्यान में फंड हो - उसकी प्रतीक्षा करने के बजाय पर्युषण से पहले ही (पेढ़ी में या ट्रस्टी से संपर्क करके) अपनी राशि लिखवा दें। जितनी जल्दी लिखवाएंगे, उतनी जल्दी पुण्य बंधेगा... और अधिक बंधेगा।
राशि तो देनी ही है, उतनी ही देनी है - तो अधिक पुण्य क्यों न बाँधें?
जितनी जल्दी संभव हो, राशि भर देनी चाहिए। राशि भरने में विलंब - यह दान का दूषण है, जो उसके फल को घटाता है। देर करके भी उतनी ही राशि देनी है - तो देर करके पुण्य को इतना क्यों घटाएं?
जिस क्षेत्र में खर्च अधिक हो - आवश्यकता अधिक हो, उसमें दान करने से अधिक लाभ मिलता है। इसलिए साधारण खाता, पाठशाला, आयंबिल खाता - जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता (Priority) देनी चाहिए।
जिन धर्म-स्थानों का आप आराधना के लिए उपयोग करते हैं, उनका निर्वाह - यह आपकी जिम्मेदारी है।
उनका निर्वाह होगा, तभी भविष्य में आप और आपके संतान आराधना कर सकेंगे। इसलिए वास्तव में यह दान नहीं है - खर्च का आपके हिस्से का भाग है।
दान देकर हम किसी पर उपकार नहीं करते। संघ हमारी संपत्ति लेकर, हमें पुण्य बाँधने का अवसर देकर हम पर उपकार करता है... उस भावना से भावित होना चाहिए।
पुण्यबंध - यह दान का सामान्य बाहरी फल है। जिस आराधना के लिए दान दें, उस आराधना के प्रति आपका बहुमान (सम्मान) बढ़े... आपके जीवन में वह आराधना आए - दृढ़ हो - बढ़े - विशुद्ध हो… यही दान का सच्चा फल है। संपत्ति की मूर्च्छा (आसक्ति) टूटे - यह भी दान का एक सुंदर आंतरिक फल है। उस फल के मुख्य लक्ष्य (Main Target) को ध्यान में रखकर दान देना चाहिए।
Article written by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.

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