आत्मज्ञान...

अतत्त्व : ‘आत्मज्ञान’ अर्थात् आत्मा को देखना – आत्मा का ‘दर्शन’।
तत्त्व : ‘आत्मज्ञान’ क्या है? इस पर विचार करने से पूर्व, हम इससे मिलते-जुलते कुछ अन्य शब्दों को देखते हैं।
‘व्यवसाय का ज्ञान’ क्या है? ‘व्यवसाय को देखते रहना’? या ‘किस प्रकार व्यवसाय करने से कमाई होती है’ – इसका ज्ञान?
व्यवसाय को केवल देखते रहने वाले के लिए कोई यह नहीं कहेगा कि ‘उसे व्यवसाय का ज्ञान है।’ जिसे यह ज्ञान हो कि ‘किस प्रकार व्यवसाय करने से कमाई होती है?’, उसी के लिए कोई कहेगा कि ‘उसे व्यवसाय का ज्ञान है।’
ऐसी ही बात रसोई के ज्ञान के लिए है।
बनी हुई या बनती हुई रसोई को देखते रहने वाले को ‘रसोई का ज्ञानी’ नहीं कहा जाता, जिसे स्वादिष्ट रसोई बनाना आता हो (अर्थात् जो यह जानता हो कि ‘किस प्रकार रसोई बनाने से वह स्वादिष्ट बनती है?’) उसी को ‘रसोई का ज्ञानी’ कहा जाता है।
यही बात आत्मज्ञान के लिए है।
‘आत्मा को देखते रहना’ या ‘आत्मा का दर्शन’ करना आत्मज्ञान नहीं है; ‘आत्मा का हित किससे होता है? अहित किससे होता है?’ – इसका ज्ञान ही आत्मज्ञान है।
षोडशक ग्रंथ में हरिभद्रसूरिजी म.सा., द्वात्रिंशद् द्वात्रिंशिका ग्रंथ में महोपाध्याय यशोविजयजी म.सा. आदि अनेक शास्त्रकारों ने ज्ञान के तीन प्रकार बताए हैं, जिसमें दूसरा प्रकार बताया है – आत्मपरिणतिमत् ज्ञान।
उस ज्ञान की व्याख्या करते हुए वहाँ बताया गया है – आत्मा के हित में जो हेय है, उसे हेय रूप में... जो उपादेय है, उसे उपादेय रूप में... जानना ही आत्मपरिणतिमत् ज्ञान है।
इसके केंद्र में आत्मा होने के कारण इसी को आत्मज्ञान कहा जाता है।
और, आत्मपरिणतिमत् ज्ञान, समकिती को ही बताया गया है। इसलिए जहाँ समकिती को ही आत्मज्ञान बताया गया हो, वहाँ उसे आत्मपरिणतिमत् ज्ञान ही समझना चाहिए; अर्थात् ‘आत्मा का हित-अहित किससे होता है?’ – यही ज्ञान समझना चाहिए।
आत्मज्ञान का ऐसा अर्थ करने पर ही, शास्त्र में आत्मज्ञान को रत्नत्रयी स्वरूप कहे जाने की बात सुसंगत होती है 🡺
❖ आत्महित में जो करने योग्य है, उसे उपादेय मानना...
आत्महित में जो त्यागने योग्य है, उसे हेय मानना...
यही तत्त्वश्रद्धा है, जो सम्यग्दर्शन है।
❖ आत्महित के लिए क्या करने योग्य है? क्या त्यागने योग्य है? इसे यथार्थ रूप में जानना, सम्यग्ज्ञान है।
❖ आत्महित के लिए जो करने योग्य है, उसका आचरण करना...
आत्महित के लिए जो त्यागने योग्य है, उसका त्याग करना...
यह सम्यक् चारित्र है।
इस प्रकार, आत्मज्ञान का ही श्रद्धांश सम्यग्दर्शन बनता है, ज्ञानांश सम्यग्ज्ञान बनता है और प्रवृत्ति-अंश सम्यक् चारित्र बनता है – ऐसा योगशास्त्र ग्रंथ में कलिकालसर्वज्ञ हेमचंद्रसूरि म. लिखते हैं।
Article written by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.

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