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उजमणुं...

Sep 7
3 min read
An illustration explaining the three types of Hinsa in Jainism as taught by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.


प्रश्न : तपश्चर्यानुं उजमणुं शी रीते करवुं जोइए ?

उत्तर :उजमणुं(उद्यापन) करवानुं शा माटे ? ए पहेलां समजवुं जोइए...

तपश्चर्या (के कोइपण आराधना), देव-गुरुनी कृपा अने अनेक आराधको-कार्यकरोनी सहायता-प्रेरणा-मार्गदर्शन-

आलंबन वगेरेथी थाय छे.

जेमना थकी आराधना थई शकी, ते सहु प्रत्ये कृतज्ञता व्यक्त करवा माटे तेमनी भक्ति – ए उजमणानुं प्रयोजन समजाय छे. एटले, आराधक 🡺

❖  प्रभुनी अंगरचना, प्रभुभक्तिनी सामग्री अर्पण करवी, विशिष्ट प्रकारे पूजा, तीर्थयात्रा... वगेरे रूपे प्रभुनी भक्ति करे.

❖  गुरु भगवंतोने संयममां सहायक उपकरणो वहोराववा, ज्ञानसाधनामां सहायक ग्रंथो छपाववा, वर्तमान व्यवस्था मुजब विहारमां तेमनी भक्ति करवी, तेमने भणवा माटे उचित व्यवस्था करवी... वगेरे रूपे भक्ति करे.

❖  श्रावक-श्राविकाओने आराधनानी सामग्री आपवा रूप भक्ति करे... संघूपजा करे... साधर्मिक-वात्सल्य करे... यात्रा वगेरे आराधना करावे...

आ उजमणानुं नक्कर स्वरूप होइ शके.

  • वर्तमानकाळमां उजमणुं एटले कोइक कार्यक्रम (ए पछी पूजन होय के भावयात्रा के अभिषेक...) अने स्वजनो(सगांवहालांओ)ने जमाडवा – तेवो व्यवहार थइ गयो छे.

    स्वजनोने जमाडवा – एने तो धर्म मानी शकाय नहीं ज. सकळ संघनी भक्ति करे के पधारेल सहु साधर्मिकोनी भक्ति करे; तो जुदी वात छे. मात्र स्वजनोने जमाडवा – ते शी रीते धर्म बने ? एवुं मानो, तो लग्नना जमणवारने पण साधर्मिक भक्ति रूप धर्म मानवो पडे.

    अने जे कार्यक्रमो कराय छे, ते मोटे भागे करवा खातर कराय छे... तेमां प्रभुभक्ति-गुरुभक्ति के संघभक्ति होय – तेवुं देखातुं नथी...

  • जेना केन्द्रमां देव-गुरु अने संघ होय, तेमनी भक्ति होय... स्वजनो न होय... तेने वास्तविक उद्यापन कही शकाय.

    धर्मने साची रीते समजनारे, साची रीते करवा इच्छनारे... ए रीते ज उद्यापन करवुं जोइए.

  • क्यारेक, बे प्रकारनी वात आवे छे 🡺

    1.  आ रीते देव-गुरु वगेरेनी भक्ति तो करीए... पछी व्यवहार माटे पण स्वजनोने तो बोलाववा तो पडे ज छे... त्यारे शुं करवुं जोइए ?

    2.  अमे जो कोइ कार्यक्रम न करीए, तो स्वजनो शाता पूछवा माटे अलग-अलग आवे, तेना कारणे बीजी घणी

    मुश्केलीओ ऊभी थाय छे. तेनाथी बचवा एक कार्यक्रम राखीने बधाने एक साथे बोलाववा सारा पडे छे.

    त्यारे शुं करवुं ?

    आनो जवाब आपतां पूर्वे एक वात करी दोहरावीश के मूळभूत रीते देव-गुरु-संघनी भक्ति, ए ज उजमणुं छे – ए वात पहेलां हृदयस्थ करवानी अने सारी रीते अमलमां मूकवानी होय, तेना आ प्रश्ननो जवाब आपी शकाय.

    जेने साचुं उजमणुं करवुं ज नथी, स्वजनोनो व्यवहार ज साचववो छे, तेने शुं मार्गदर्शन आपीए ?

  • एटले, जेने साची रीतनुं उजमणुं कर्या पछी (के करवानुं आयोजन कर्या पछी)नो प्रश्न छे; तेना माटे केटलीक विचारणा जणावुं छुं 🡺

    ❖  वर्तमान व्यवस्थाओमां, स्वजनोनो जमणवार केटररने सोंपाय छे, तेमां जे घोर अजयणाओ थाय छे, तेनुं

    वर्णन करवा पुस्तक लखवुं पडे.

    प्रभुनी आज्ञा–जयणा प्रत्येनी बेदरकारी-उपेक्षाथी थती आवी विराधनानुं पाप, कदाच आराधनाथी करेला कर्मक्षय करतां वधी जतुं होय, तो नवाइ नहीं !

    (एवी विराधनानुं जे प्रायश्चित्त शास्त्रोमां बताव्युं छे, ते जोतां तो एम ज लागे के आराधना करतां प्रायश्चित्त मोटुं थइ जाय.) एटले, जमणवारमां जयणानी महत्तम काळजीनो प्रयत्न होवो जोइए. जयणा विना धर्मनो

    जन्म पण थतो नथी – एम शास्त्रमां कह्युं छे.

    ❖  कार्यक्रम प्रभुभक्तिनो होय, तो तेमां भक्ति पूरेपूरी थवी जोइए... प्रभुनां काम पूजारी करे... संगीतकारो

    भक्तिना बदले मनोरंजन करे... रिसेप्शन जेवा फोटोसेशन थाय... वस्त्र वगेरेनी मर्यादाओ जळवाय नहीं... ते बधी घोर अनादर जनित अविधिओ जोतां पण ए ज प्रश्न थाय के आमां सरवाळे लाभ छे के नुकसान ?

    मने तो घणीवार एवुं लागे छे के कोइ संगीतकार–विधिकार राख्या वगर, आराधक सपरिवार स्नात्र

    भणावे... ठाठथी अष्टप्रकारी पूजा करे... तो घणी-घणी वधारे सारी आराधना थाय...

    ❖  शक्य होय, तो आवेला सहु एक कलाक गुरु भगवंतनुं प्रवचन सांभळे – एवुं आयोजन अवश्य करवुं...

    ❖  धंधादारी विधिकारो–पंडितोमां बहु ओछा पासे साचुं ज्ञान छे... तेओ ज उपदेश आपे  - तेवा कार्यक्रमो

    टाळवा.

    ❖  आवेलाए (प्रवचन सिवायना कार्यक्रममां) मात्र बेसीने सांभळवानुं न होय, स्वयं आराधनामां जोडावानुं होय – तेवुं आयोजन करवुं.

    (हाल तो विचित्र व्यवस्था एवी छे के पूजनादिमां ज्यारे सहुए जाप करवाना होय छे, त्यारे कान फाडी

    नाखता अवाजे संगीत चालतुं होय छे ! एमां जाप शी रीते थइ शके ?)

    ❖  धर्मस्थानमां बिराजमान गुरु भगवंतोना स्वाध्यायादिमां विक्षेप न थाय... ग्लानादिने असमाधि न थाय...

    तेनुं अवश्य ध्यान राखवुं...

    ❖  संघनी नियत आराधनाओ – खास करीने व्याख्यान-पाठशाळा वगेरेने हानि न पहोंचे – तेनुं पण ध्यान

    राखवुं.

    ❖  माइक अने रसोडानी गंदकी (अने पार्किंग) थी आसपासना लोकोने जिनशासन प्रत्ये दुर्भाव ऊभो न थाय – तेनी काळजी अवश्य करवी.

    आवा बधा विवेकपूर्वक कार्यक्रम थाय, तो ते आराधनाने सानुबंध बनावी शके.

    बाकी, जयणानो भोग लइने, प्रभुनी आशातना करीने, गुरु भगवंतोना स्वाध्यायमां विक्षेप करीने, आसपासना लोकोने जिनशासन पर दुर्भाव कराववा द्वारा दुर्लभबोधि बनावीने थता कार्यक्रमनुं फळ शुं हशे ? ते ज्ञानी जाणे.



Article written by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb for Magazine Shanti Saurabh.



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