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गीतार्थ गुरु...

Aug 24
4 min read

Updated: Aug 26

An illustration explaining the three types of Hinsa in Jainism as taught by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.


प्रश्न : गीतार्थ गुरु कोने कहेवाय ?

उत्तर :आ प्रश्ननो उत्तर आपतां पहेलां, एक वात स्पष्ट करी दउं – गुरुतत्त्वना बे विभाग करवाना छे.

1. जेमना दर्शन-वंदन-भक्ति करवाना...

2. जेमनुं मार्गदर्शन लेवानुं...

दर्शन-वंदनादि माटे गुरुमां गीतार्थता जोवानी होती नथी, आचारसंपन्नता वगेरे जोवाना होय छे.

एटले, कदाच अगीतार्थ होय, तेटला मात्रथी दर्शन-वंदनादि करवा योग्य नथी – एवुं न मानवुं.

  • जेमनुं मार्गदर्शन लेवानुं छे, ते गुरु गीतार्थ (ज्ञानी) होवा जरूरी छे.

    रोगथी मुक्त थवा एवा वैद/डोक्टरनुं ज मार्गदर्शन लेवाय, जेने ए विषयनुं ज्ञान होय.

    रस्तो पूछवो होय, तो एने ज पूछाय, जेने पोताने रस्तो खबर होय.

    जेने पोताने ज ज्ञान नथी, ते बीजाने शुं मार्गदर्शन आपी शके ?

    एटले, जे अगीतार्थ छे, जेमने पोताने ज प्रभुए बतावेल मार्गनुं व्यवस्थित ज्ञान नथी, तेमनुं मार्गदर्शन न लेवाय... भले ते उग्र तपस्वी होय के चुस्त संयमी होय के तमारा उपकारी होय...

    शास्त्रमां स्पष्ट जणाव्युं छे के अगीतार्थ पासे जिनवाणी सांभळवामां पण अहित थवानी घणी मोटी संभावना छे.

  • हवे मूळ प्रश्न पर आवुं. गीतार्थ कोने कहेवाय ?

    शास्त्रमां कह्युं छे - ‘चौद पूर्व भण्या होय, ते उत्कृष्ट गीतार्थ छे.’ आवा तो अत्यारे कोई मळवाना नथी.

    तो जघन्य (नानामां नाना) गीतार्थ कोने कहेवाय ?

    ते माटे शास्त्रमां कह्युं छे - ‘छेदग्रंथोनो अमुक हद सुधीनो अभ्यास जेणे कर्यो होय, ते जघन्य गीतार्थ छे.’

  • आ छेदग्रंथो शुं छे ? ते तमारो विषय नथी, एटले में नाम न कह्युं. एटलुं कहीश के छेदग्रंथोमां उत्सर्ग अने अपवाद – एम बंने प्रकारना मार्गनुं निरूपण छे. एने जे भण्यो होय, ते ज गीतार्थ कहेवाय.

  • अहीं ‘भणवुं’ शब्दनो अर्थ शुं करवानो ?

    वांची जवुं के गोखी नाखवुं – ते ‘भणवुं’ शब्दनो अर्थ नथी. पण ग्रंथना पदार्थो समजवा, अने तेने आत्मसात् करवा – तेनुं नाम ‘भणवुं’ छे.

    गोखीने पट-पट बोली जाय, ते तमने आश्चर्यजनक लागे छे, तेने तमे विद्वान् मानी लो छो.

    हकीकतमां पदार्थनुं तलस्पर्शी ज्ञान होय, ते साची विद्वत्ता छे. तेणे कदाच सूत्रो गोख्या न होय, पट-पट बोली न शके, ते संभवित छे. पण, ते विषयना कोइपण प्रश्ननो दरेक एंगलथी विचार करीने व्यवस्थित उत्तर आपी शके.

  • ग्रंथनी रचना करनारना मनमां कोइक पदार्थ होय छे. ए पदार्थ, वाचकने जणाववा माटे ते ग्रंथना शब्दोनो माध्यम तरीके उपयोग करे छे.

    ते शब्दोना माध्यमे, ग्रंथकारना मनमां रहेला पदार्थने जाणवो-समजवो, ते साचो अभ्यास छे.

    तेने ज तात्पर्यनो बोध कहेवाय छे.

    तेवा तात्पर्यना बोध विना, शब्दो गोखी लेवा के उपलकिया अर्थ करी जवा – ते साची विद्वत्ता नथी.

  • तमारी बधानी समजण बहु छीछरी होय छे. संस्कृतमां निपुण होय, तेने तमे विद्वान् मानी लो छो. खरेखर तो ए मात्र भाषानी निपुणता छे. जिनवचनमां कहेला पदार्थोनो बोध तो तेमां छे ज नहीं. तेना विना साचा ज्ञानी शी रीते कहेवाय ?

    ए रीते, संस्कृत जेवी भाषामां लेखन के काव्यरचना करे, तेने तमे विद्वान् मानी लो छो.

    हकीकतमां तो ए पण भाषानी ज विद्वत्ता छे. पदार्थबोध तो आखी जुदी ज वस्तु छे. ते न होय, तो तेने ज्ञानी शी रीते कही शकाय ?

    एटले, ए याद राखो के पदार्थोनो तलस्पर्शी बोध होवो – ए साचुं ज्ञान छे. भाषानुं ज्ञान तेमां किंचित् सहायक बनी शके, पण मात्र भाषानुं ज्ञान होवाथी ‘ज्ञानी’ न मानी लेवाय के कही न देवाय.

  • तात्पर्यनो बोध कोने कहेवाय ? ते समजवा माटे एक दृष्टांत छे.

    माता बहार जती वखते दीकराने कहीने गइ - ‘रसोडामां दहीं पड्युं छे. ध्यान राखजे, कागडा खाइ न जाय.’

    कलाक पछी पाछी आवेली माताए जोयुं, तो दहीं सफाचट हतुं. दीकराने पूछ्युं - ‘दहीं क्यां गयुं ?’ दीकराए कह्युं - ‘बिलाडी खाई गई.’ माताए पूछ्युं - ‘तें तेने अटकावी नहीं ?’ दीकराए कह्युं - ‘तमे कागडो खाई न जाय – तेनुं ध्यान राखवा कह्युं हतुं. बिलाडी खाई जाय – तेनो क्यां वांधो हतो ?’

    अहीं माताना शब्दो भले कागडाने जणावे छे, तात्पर्य तो ए ज हतुं के दहीं सुरक्षित रहेवुं जोइए. दीकराए तात्पर्य पकडवाना बदले शब्दो पकड्या, तो नुकसान थयुं.

  • आ दृष्टांत तो लौकिक छे, पण आवुं घणीवार बने छे के शास्त्रना शब्दो पकडी लेवामां आवे छे, तात्पर्य समजवानो प्रयास ज नथी होतो.

    ए साची गीतार्थता नथी, भले गमे तेटला शास्त्रो वांच्या होय अने याद होय.

    घणीवार तो तात्पर्य समज्या विना शब्दो पकडी रखाय, तो महा-अनर्थ सर्जाय. ए समजवा माटे एक वात जणावुं.

    जंगलना विहारमां महात्मा बिमार पडे, तो तेमने गाडामां नजीकना शहेर/गामे लइ जवा – तेवुं शास्त्रमां जणाव्युं छे.

    हवे वर्तमानमां कोइ साधुने रस्तामां एक्सिडन्ट थवाना कारणे नजीकना शहेरमां लइ जवाना होय, त्यारे कोइ शास्त्र भणेलो (?) साधु, शास्त्रपाठ टांकीने एम कहे के ‘गाडामा लइ जाव.’ तो ते शास्त्र भणेलो न कहेवाय, कारणके शास्त्रना तात्पर्यने ते समज्यो नथी.

    ग्रंथकारना मनमां शुं वात छे ? वहेली तके साधुनी चिकित्सा कराववानुं महत्त्व छे, गाडानुं कोई महत्त्व नथी. ते काळे, तेना माटे उपलब्ध वाहन गाडुं होवाथी तेनुं नाम लख्युं छे. ते शब्द पकडी राखे, ‘ग्रंथकारना मनमां शुं छे ?’ ते समजे ज नहीं, ते शास्त्र भणेलो न कहेवाय.

    जे ग्रंथकारना मनमां रहेला पदार्थने समजीने वर्तमानकाळे उपलब्ध वाहन (एम्ब्युलन्स)मां लइ जवानी रजा आपे, ते खरो ज्ञानी कहेवाय, कारणके शास्त्रना तात्पर्यने समज्यो छे.

    ए पंचमकाळनी बलिहारी छे के शास्त्रना तात्पर्यने अवगणीने शब्दोने पकडी राखनारा, शास्त्रना वफादार अने शास्त्रचुस्त गणाय छे (कारणके तेओ तेवो प्रचार करे छे), अने तात्पर्यने समजीने तेने अमलमां मूकनारा, शास्त्रलोपी कहेवाय छे (कारणके तेवो प्रचार तेमना विरोधीओ करे छे).

  • सार ए छे के छेदग्रंथ सुधीना शास्त्रोनो अभ्यास करीने, तेना तात्पर्यने समजीने, ‘कइ परिस्थितिमां शुं करवाथी आत्मानुं हित थाय ?’ ते जाणी शके अने कही शके – ते गीतार्थ छे.

  • साथे एक वात ध्यानमां राखवी – केटलीक वस्तुनुं ज्ञान, अनुभवथी ज थाय.

    ‘चालवाथी थाक लागे’ ए शब्दोथी थतुं ज्ञान, अने स्वयं चालवाथी थाकनो जे अनुभव थाय, तेनुं ज्ञान – ए बे जुदी ज वस्तु छे.

    एटले, गीतार्थता माटे जेम शास्त्रनो तलस्पर्शी बोध जरूरी छे, तेम पोताना जीवनमां आराधना वगेरेनो अने अन्योना योगक्षेमनो अनुभव पण जरूरी छे.

    अनुभव विनानो तर्क, क्यारेक शेखचल्लीना तुक्का जेवो पुरवार थतो होय छे.



Article written by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb for Magazine Shanti Saurabh.



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