अभव्य जीव और प्रभु की करुणा...

प्रश्न : प्रभु ने अभव्य जीवों के लिए क्या किया ?
उत्तर :
यदि यह प्रश्न जिज्ञासावश पूछा गया है, तो और बात है; किंतु यदि यह केवल प्रभु की अवहेलना करने के लिए पूछा गया है, तो पूछने वाला करुणा-उपेक्षा का पात्र है - उत्तर देने योग्य नहीं।
एक सनातन नियम है कि जीव अपने पुरुषार्थ से ही सुखी या दुःखी होता है... कोई अन्य उसे सुखी या दुःखी नहीं कर सकता। हाँ, कोई सुख का उपाय बता सकता है, उस पर चलने की प्रेरणा दे सकता है... दुःख के कारण बता सकता है, उनसे दूर रहने के लिए सचेत कर सकता है... किंतु अंततः जीव को स्वयं ही सुख के मार्ग पर चलना होता है, और दुःख के कारणों से दूर रहना होता है... तभी वह दुःख से मुक्त होकर सुखी हो सकता है।
प्रभु ‘सर्व जीव सुखी हों’ इस भावना के स्वामी थे... यही भावना उन्हें तीर्थंकर बनाती है।
किंतु प्रभु किसी को सुखी कर नहीं सकते। (यह स्मरणीय है कि अन्य दर्शनों के समान जैन दर्शन ईश्वर को जगत्कर्ता नहीं मानता।) यदि वे ऐसा कर सकते, तो किसी को दुःखी क्यों रहने देते ?
प्रभु तो सभी जीवों को यह बताते हैं कि ‘सुख कहाँ है? उसे प्राप्त करने का उपाय क्या है? दुःख किसमें है? और उससे मुक्त होने का मार्ग क्या है?’ यही मार्गदर्शन प्रभु का हम पर उपकार है। यह उपकार साधारण नहीं है, क्योंकि इसी ज्ञान के अभाव में हम अनंत काल से दुःखी होते आए हैं। कोई भला व्यक्ति उस उपकार को भी जीवन भर नहीं भूलता जो उसे व्यवसाय सिखाकर २५-३० वर्षों के लिए सुखी होने का मार्ग दिखाता है... तो फिर जो प्रभु सदा के लिए सुखी होने का उपाय बताते हैं, उनके उपकार का तो कहना ही क्या ?
प्रभु ने तो मार्ग दिखा दिया। किंतु भारी कर्मों वाले (अभव्य या दूरभव्य) जीव, प्रभु की बात को स्वीकार नहीं करते... उन्हें यह प्रतीत ही नहीं होता कि प्रभु द्वारा दिखाए गए मार्ग पर सुख मिलेगा... इसलिए वे उस मार्ग पर नहीं चलते... वे अपनी कल्पना के सुख-मार्ग पर चलते हैं, जो वास्तव में दुःख का मार्ग होने के कारण उन्हें दुःखी करता है। इसमें प्रभु क्या कर सकते हैं ?
अतः, ‘प्रभु ने अभव्य जीवों के लिए क्या किया?’ यह प्रश्न ही जैन शासन के विषय में अज्ञान का परिचायक है। प्रभु ने तो सभी को सुखी करने की भावना रखी और उसका मार्ग दिखाया... इसमें उन्होंने कोई भेदभाव नहीं किया। यह और बात है कि जो जीव मानने को तैयार ही नहीं है, उसे प्रभु साक्षात् उपदेश नहीं देते; जैसे कि जमालि... किंतु प्रभु की करुणा से कोई भी वंचित नहीं होता।
Article written by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.

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