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सूर्यास्त के २-५ मिनट बाद तक खाया हो (जब उजाला हो) तो क्या उसे चौविहार किया हुआ माना जाएगा? क्या उसका पच्चक्खाण लिया जा सकता है?...

Oct 3
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प्रश्न : सूर्यास्त के २-५ मिनट बाद तक खाया हो (जब उजाला हो) तो क्या उसे चौविहार किया हुआ माना जाएगा? क्या उसका पच्चक्खाण लिया जा सकता है?

उत्तर :

यदि ऐसा नियम बनाया जाए कि उजाले में खाया हो (अंधेरे में नहीं), तो उसे चौविहार माना जाएगा – तो कई प्रश्न खड़े होंगे।

उजाला-अंधेरा सापेक्ष शब्द हैं। सूर्यास्त के १५ मिनट बाद भी थोड़ा उजाला होता है... यह भी कहा जा सकता है कि ‘उजाला भी है, अंधेरा भी है’।

तो उस समय खाने वाले के लिए क्या माना जाए?


निश्चय अलग होता है और व्यवहार अलग होता है – यह एक सार्वत्रिक व्यवस्था है।

‘किसे मत देना है?’ यह सोचने की क्षमता आने के बाद मताधिकार दिया जाता है। अब ऐसा तो है नहीं कि १७ वर्ष ३५९ दिन तक वैसी क्षमता नहीं आती; और एक रात में आ जाती है। यह क्षमता क्रमशः विकसित होने वाली चीज़ है।

किन्तु, व्यवहार के लिए कोई ‘कट ऑफ़’ तिथि निर्धारित करनी पड़ती है... वह १८ वर्ष की गई, क्योंकि १८ वर्ष की आयु में (अधिकांशतः) वैसी क्षमता आ ही जाती है...


फल को सुधारने करने के ४८ मिनट बाद अचित्त माना जाता है।इसमें भी ऐसा तो नहीं है कि ४७ मिनट ५९ सेकंड तक वह सचित्त रहता है, और १ सेकंड में अचित्त हो जाता है... वह ४८ मिनट के भीतर कभी भी अचित्त हो जाता है। किन्तु व्यवहार के लिए एक ‘कट ऑफ़’ समय निर्धारित करना पड़ता है... वह ४८ मिनट किया गया, क्योंकि तब तक वह अचित्त हो ही जाता है।


इसी प्रकार, अंधकार में जीवोत्पत्ति होने के कारण भोजन का निषेध है।

निश्चय से जीवोत्पत्ति कब होती है? यह हम जान नहीं सकते... व्यवहार से इसके लिए ‘कट ऑफ़’ समय सूर्यास्त को निर्धारित किया गया है। अतः इसका उल्लंघन कदापि नहीं करना चाहिए।

कदाचित् जीवोत्पत्ति नहीं ही हुई है - ऐसा किसी ज्ञान से ज्ञात हो जाए, तब भी व्यवहार से उसका उल्लंघन कदापि नहीं किया जा सकता... जैसे तिल के अचित्त होने का ज्ञान होने पर भी प्रभु वीर ने उसे उपयोग में लेने की अनुमति नहीं थी, क्योंकि व्यवहार से उसे सचित्त ही माना जाता है।


वास्तव में तो सूर्यास्त से ४८ मिनट पहले ही भोजन का त्याग कर देना चाहिए। (अनेक साधु-साध्वी भगवंत उस समय जल का भी त्याग कर देते हैं।) अंतिम ५-१० मिनट तो अवश्य ही छोड़ने हैं। उस समय भोजन करने को ‘लगभग वेला’ नामक अतिचार बताया गया है। तो सूर्यास्त के बाद कुछ ग्रहण करने का प्रश्न ही कहाँ उठता है?




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