जेओ मोक्षे ज गया छे, तेमना अन्य धर्मना मंदिरमां दर्शन करवा केम न जवाय ?
- Jun 4
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प्रश्न: जेओ मोक्षे ज गया छे, तेमना अन्य धर्मना मंदिरमां दर्शन करवा केम न जवाय ?
उत्तर : निश्चयनयथी जे वंदनीय होय, ते बधा व्यवहारथी वंदनीय नथी बनता. भरत चक्रवर्ती गृहस्थवेशमां केवळज्ञान पाम्या, एटले तेरमा गुणस्थानके पहोंची गया. निश्चयनयथी तो वंदनीय हता ज. पण ज्यां सुधी साधुवेश ग्रहण न कर्यो, त्यां सुधी व्यवहारथी वंदनीय नथी बन्या. साधुवेश लीधा पछी ज इन्द्रए तेमने वंदन कर्या छे.
जेओ मोक्षे गया छे, ते निश्चयनयथी पूज्य छे - वंदनीय छे, पण व्यवहारथी तो साधु तरीकेनी के सिद्ध तरीकेनी तेमनी प्रतिमा होय, ते ज वंदनीय बनी शके. अन्य धर्मना मंदिरोमां जे मूर्ति होय छे, ते तेवी होती नथी, एटले वंदनीय नथी बनती. एथी आगळ वधीने शास्त्रकारो कहे छे - अरिहंतनी प्रतिमा पण जो अन्योना कबजामां होय - अन्योना मंदिरमां होय; तो ते पण वंदनीय नथी बनती. सम्यक्त्व ग्रहण कराय छे, त्यारे जे प्रतिज्ञा अपाय छे, तेमां स्पष्ट विधान छे - आज पछी अन्यधर्मी द्वारा परिगृहीत एवी अरिहंतनी प्रतिमाने पण वंदन नहीं करुं.
तेने वंदन करवानो निषेध करवाना बे कारणो छे
अन्योना मंदिरमां रहेल अरिहंतनी प्रतिमाने ज हुं वंदन करवा जाउं, तो पण जोनारने तो एम ज लागे के - ‘अन्योना मंदिरमां जई शकाय.’ पछी त्यां जईने बीजानी प्रतिमाना दर्शन-वंदन न करवा - एवी कंई बधाने खबर पडती नथी. आम, खोटुं आलंबन मळे - व्यवहार अशुद्ध थाय. तेथी अन्यना मंदिरमां जवानुं नथी.
अन्योना मंदिरमां अरिहंतनी प्रतिमाने वंदन करवा जाव, तो पण ते लोको प्रचार द्वारा तमने आकर्षवाना प्रयत्न करवाना ज. तेना प्रचारथी अंजाईने ‘तेमनी वात साची छे - सारी छे. आपणे त्यां खोटुं छे’ एवा विचारो तमने आवे तेवी शक्यता छे ज. तेनाथी तमारुं सम्यक्त्व मलिन थाय. क्यारेक तमे सम्यक्त्व गुमावी बेसो, अन्यधर्मी थइ जाव - एवी पण शक्यता छे ज; कारणके तमे भणेला नथी, जिनशासननी श्रेष्ठता जाणता नथी, अन्योनी वातो केम खोटी छे ? ते खबर नथी. तेथी तमारुं सम्यक्त्व तेवुं दृढ-निश्चल होतुं नथी.
विचारवा जेवुं ए छे के, अन्य धर्मीओ पोताना मंदिरमां अरिहंतनी प्रतिमा राखे शा माटे ? तमने आकर्षीने पोतानो प्रचार करवा माटे स्तो ! आ बधा कारणोथी ज शास्त्रकारोए तेवा अन्यधर्मीओ साथे वधु पडतो परिचय-मित्रता करवानो पण निषेध कर्यो छे. तेमनुं साहित्य पण न वंचाय. तेमना प्रवचनो पण न संभळाय.
सभा : जेमा बीजानी साथे भगवाननी पण प्रतिमा होय, तेना दूरथी-गाडीमांथी वंदन कराय ?
ना. ते व्यवहार पण अशुद्ध छे. तेमां पछी ‘अहींथी नमस्कार थाय, तो अंदर केम न जवाय ?’ एवो कुतर्क आववानो ज. ‘जावंति चेइआई’ सूत्रथी, भावथी ते बधी प्रतिमाओने नमस्कार करी शकाय. अन्य धर्मोना स्थानोमां कुतूहलथी - जोवालायक स्थळ रूपे पण फरवा-जोवा न जवाय, कारणके तेमां उपर कह्या ते बधा भयस्थानो छे. फरवा ज न जवुं जोईए. पण मोजशोखना स्थाने फरवा जाव, तो तेमां अविरति छे. अन्य धर्मोना स्थाने फरवा जाव, तो तेमां मिथ्यात्वनी शक्यता पडी छे. अविरति करता अपेक्षाए मिथ्यात्व वधु भयंकर छे.जे देव-देवी समकिती छे, तेमनी पण आपणने मान्य तेवा स्वरूपनी, आपणा कबजामां रहेली प्रतिमा होय, तो ज तेमनी उचित (साधर्मिक रूपे) भक्ति, स्मरण वगेरे थइ शके. ते ज नामना देव-देवी होय, पण जो बीजाना कबजामां होय के अन्य स्वरूपना होय तो तेनी तेवी भक्ति वगेरे न थाय.
Article written by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.

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