कौन-सा ध्यान केवलज्ञान प्रदान करता है?....

आपने केवलज्ञान होने के अनेक दृष्टांत सुने हैं— गोचरी ग्रहण करते हुए,
भोजन करते हुए, परठवते हुए... रस्सी पर नाचते हुए... केवलज्ञान हुआ।
उन्हें शुक्लध्यान तो अवश्य ही हुआ होगा, क्योंकि उसके बिना केवलज्ञान
नहीं हो सकता।
तो क्या वे आँखें बंद करके ध्यान करने बैठे थे? बिल्कुल नहीं।
वे जो क्रिया कर रहे थे, उसी में उनका चित्त एकाग्र हुआ और साथ ही
राग-द्वेष को कम करने का तीव्र प्रणिधान था— वही उनका शुक्लध्यान है।
गौतमस्वामी के 500 तापस शिष्यों को खीर से पारणा करते-करते ही
केवलज्ञान हुआ। वहाँ उनके भोजन करने की क्रिया में ही— उसी क्रिया
में चित्त की एकाग्रता ध्यानरूप बन गई— ऐसा शास्त्रों में स्पष्ट रूप से कहा गया है।
हाँ, अंतर्मन में दोषों को कम करने का तीव्र प्रणिधान आवश्यक है, जो उनमें था।
Extract from Book Dhyan Jain Dharmani Drushtie written by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.

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