त्याग अने भावना....
Aug 30
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एक वस्तु मेळववा बीजी वस्तु त्यागे, तेमां त्यागवानी भावना प्रायः न होय- त्यागवा जेवुं लागतुं न होय.
सभा : मोक्ष मेळववा त्यागे तेने पण प्रलोभन ज कहेवाय ने ?
मोक्ष एटले शुं ? ते समज्या न होय, तेने ज आवो प्रश्न थाय.
आपणे पूर्वे जणावेलुं के साधना वीतराग बनवा माटे छे, मोक्ष तो बोनसमां मळे छे. वीतराग बनवानी इच्छानो अर्थ ज छे राग घटाडवानी भावना. ते ज त्यागवानी भावना छे.
तेमां प्रलोभन शुं छे ? कंइ नहीं.
फरी वात करुं – त्याग अवश्य करवानो छे, पण साथे त्यागवानी भावना जोइए. तो ज आत्माना अशुभ संस्कार घटे.
अभव्य आखो संसार त्यागे छे. पण तेने त्यागवा जेवो लागतो नथी. परभवमां मोटो संसार मेळववा माटे त्यागे छे. एटले ज तेना अशुभ संस्कार घटता नथी.
Extract from Book Adhyatma Marg written by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.
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