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त्याग अने भावना....

Aug 30
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શું થાળી ધોઈને પીવાથી આયંબિલ જેટલું પુણ્ય મળે? પૂજ્ય ભવ્યસુંદરસૂરીશ્વરજી મહારાજ સાહેબ સમજાવે છે 'થાળી ધોઈને પીવા' પાછળનું સાચું शास्त्रवचन અને હિંસાથી બચવાનો લાભ



एक वस्तु मेळववा बीजी वस्तु त्यागे, तेमां त्यागवानी भावना प्रायः न होय- त्यागवा जेवुं लागतुं न होय.


सभा : मोक्ष मेळववा त्यागे तेने पण प्रलोभन ज कहेवाय ने ?


मोक्ष एटले शुं ? ते समज्या न होय, तेने ज आवो प्रश्न थाय.

आपणे पूर्वे जणावेलुं के साधना वीतराग बनवा माटे छे, मोक्ष तो बोनसमां मळे छे. वीतराग बनवानी इच्छानो अर्थ ज छे राग घटाडवानी भावना. ते ज त्यागवानी भावना छे.

तेमां प्रलोभन शुं छे ? कंइ नहीं.


फरी वात करुं – त्याग अवश्य करवानो छे, पण साथे त्यागवानी भावना जोइए. तो ज आत्माना अशुभ संस्कार घटे.


अभव्य आखो संसार त्यागे छे. पण तेने त्यागवा जेवो लागतो नथी. परभवमां मोटो संसार मेळववा माटे त्यागे छे. एटले ज तेना अशुभ संस्कार घटता नथी.



Extract from Book Adhyatma Marg written by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.


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