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रोहिणीयो...

Sep 30
2 min read
An illustration explaining the different perspectives of Naya in Jainism as taught by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.


  • उसके पिता ने मरते समय उससे वचन लिया था – ‘दूसरा कुछ भी करना, पर महावीर का उपदेश मत सुनना।’

    मरते हुए पिता को दिया वचन उसने भली-भाँति निभाया।

    एक बार वह किसी काम से जा रहा था, और मार्ग भगवान के समवसरण के पास से ही गुज़र रहा था।

    दूसरा कोई मार्ग न होने के कारण वह उस रास्ते से गया तो सही, पर कानों में कसकर उँगलियाँ डाल दीं... ताकि भूल से भी महावीर का उपदेश सुनाई न दे– और पिता को दिया वचन न टूटे।

  • किंतु होनी को कुछ और ही मंज़ूर था – पैर में एक नुकीला काँटा चुभ गया।उसे निकालने के लिए कानों से उँगलियाँ निकालनी ही पड़ीं। और इसी बीच, न चाहते हुए भी, उसे प्रभु के तीन वाक्य सुनाई पड़ गए।

    वह एक कुख्यात चोर था, रोहिणीया उसका नाम था।

    वह ऐसा खेल रचता कि कभी पकड़ा ही न जाए।

    अभयकुमार ने अपनी बुद्धि के बल से उसे पकड़ तो लिया, किंतु अपराध सिद्ध नहीं हो पा रहा था। अपराध सिद्ध करने के लिए अभयकुमार ने जो जाल बिछाया, उससे रोहिणीया को प्रभु के उन्हीं तीन वचनों ने बचाया जो उसने अनजाने में सुन लिए थे। अन्यथा फाँसी की सज़ा तो निश्चित ही थी।

    ‘जिसके तीन वचन जीवन बचा सकते हैं, उसका पूरा उपदेश क्या नहीं कर सकता?’ – इसी विचार से रोहिणीया प्रभु के मार्ग पर चल पड़ा और उसने अपना आत्मकल्याण साध लिया...

    बिना किसी शुभ भाव के, अनिच्छा से की गई प्रभु-वचनों की श्रवण-क्रिया भी आत्मकल्याण साधने वाली बन सकती है! यह घटना हमें यही सिखाती है।

  • हम अपनी क्रिया में भाव (श्रद्धा-आदर) लाने का प्रयास अवश्य करें...

    किंतु यदि दूसरे की क्रिया भाव रहित भी हो, तो भी हम उसकी निंदा न करें... उसे तुच्छ न समझें...

    बालजीव, क्रिया के द्वारा ही जिनशासन में प्रवेश पाते हैं... भाव की समझ भी एक बार क्रिया के माध्यम से धर्म से जुड़ने के पश्चात् ही आती है।




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