भुवनभानुसू. म.सा...

किसी द्वारा भेंट की गई नई 'हीरो' फाउंटेन पेन के सुनहरे ढक्कन को वे नवदीक्षित साधु भगवंत बार-बार देख रहे थे...
उनके गुरु भगवंत ने यह देखा और उन्हें बुलाया। पेन ले ली। फिर एक अन्य साधु को बुलाकर कहा – ‘इस पेन पर पात्र को रंगने वाला काला रंग चढ़ाकर इन्हें वापस दे दो... ताकि इस पर इनका राग न हो!’
वे गुरु थे - पू. पं. भानुविजयजी म.सा., जो बाद में न्यायविशारद वर्धमान तपोनिधि पू. आ. श्री भुवनभानुसूरिजी म.सा. के रूप में प्रसिद्ध हुए
यह घटना हमें दो बातें बताती है 🡺
1. आत्मा के मुख्य दोष, राग से बचने के लिए, उसके कारण बनने वाले द्रव्यों अर्थात् अशुभ निमित्तों से कोसों
दूर रहना चाहिए।
फर्नीचर, कपड़े, गहने, शर्ट के बटन, जूते, जूतों के फीते... हर एक चीज पर राग करने वालों को
चेत जाना चाहिए - यह प्रत्येक राग भवांतर में उन्हें चकनाचूर कर देगा।
एक वस्त्र के प्रति राग ने ही सुमंगलाचार्य को अनार्य देश में अपंग के रूप में जन्म दिलाया था -
यह भूलना नहीं चाहिए।
2. महापुरुष स्वयं अशुभ निमित्तों से दूर रहे हैं और अपने आश्रितों को भी उनसे दूर रखा है।
अशुभ निमित्तों के ढेर के बीच रहकर केवल शुभ भावों की बातें करने से कोई महापुरुष नहीं बना है।
उन महापुरुष की इस सूक्ष्मतम सजगता को वंदन
Article written by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.

Comments