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गोविंदाचार्य...

Aug 11
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Updated: Aug 26

An illustration explaining the different perspectives of Naya in Jainism as taught by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.


ए हता, जैन धर्मना तीव्र द्वेषी – गोविंद एमनुं नाम...

जैनोने वादमां कोई पराजित करी शकतुं नहीं, एटले ए अत्यंत अकळाई जता हता...

एमणे विचार्युं - ‘दीक्षा लउं...जैनोना बधा ग्रंथो भणुं... एमां क्यां क्यां त्रुटिओ (Loopholes) छे – ए जाणुं... पछी जैनोने वादमां पराजित करुं...’ एना माटे एमणे दीक्षा लीधी... एवो आबाद वेश भजव्यो के गुरु पण छेतराई गया... दीक्षा आपी, भणाव्या... क्षयोपशम एटलो तीव्र हतो के सडसडाट भणी गया... एटलुं भण्या के गुरुए एमने आचार्य पदवी आपवानो निर्णय कर्यो... एमने जाण करी के ‘तमने आचार्य पदवी आपवानी छे...’ त्यारे तेमणे गुरुने कह्युं - ‘पहेलां मने फरी दीक्षा आपो...’ गुरु तो चोंकी गया... तेमणे खुलासो कर्यो - ‘में दीक्षा आत्मकल्याण माटे लीधी ज नहोती... जैनोनां छिद्रो जाणीने पराजित करवा माटे ज लीधेली... पण भणतां भणतां मने ब्रह्मज्ञान थयुं के हकीकतमां साचो मार्ग जिनशासन पासे ज छे... जैन धर्म ज सत्य छे... एटले हवे मारे साची दीक्षा लेवी छे...’

आ घटना आपणने ए बोध आपे छे के जैनोने पराजित करवाना विपरीत(अशुभ) भावथी लीधेली दीक्षा अने करायेलो शास्त्राभ्यास पण आत्मकल्याण करनारो बनी शके छे !

आपणी क्रियामां भाव (श्रद्धा-आदर) लाववानो – प्रयास चोक्कस करीए...

पण बीजानी क्रिया, भाव विनानी होय, तो पण तेने वखोडीए नहीं... तेने तुच्छ न मानीए...

बाळजीवो, क्रिया द्वारा ज जिनशासनमां प्रवेश पामे छे... भावनी समज पण एकवार क्रिया द्वारा धर्ममां जोडाया पछी ज आवे छे.




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