साधर्मिक भक्ति अने उपधानादि अनुष्ठानो...
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भ्रमणा : केटलाय साधर्मिकोने जीवन-निर्वाहना सांसा छे, त्यारे उपधानादि अनुष्ठानोमां लाखो-करोडो रूपियानो धूमाडो करवो योग्य नथी.
वास्तविकता : उपलक दृष्टिए खूब सारी जणाती आ वातनी अंदर ऊतरीए, त्यारे आवो विचार करनारानुं जिनशासननुं वरवुं अज्ञान छतुं थाय छे.
दुःखी जीवो प्रत्येनी करूणा शास्त्रकार बे प्रकारनी बतावे छे
1. द्रव्य-करूणा --> दुन्यवी दुःख दूर करवा, दुन्यवी सुखनी सामग्री आपवी... जेम के अनाज, कपडां, घर वगेरे आपवा..
2. भाव-करूणा --> धर्म समजाववो, तेनी प्रेरणा करवी, तेमां सहायक बनवुं...
वस्तुतः भाव-करूणा ए ज साची करूणा छे, कारणके तेनाथी दुःख कायम माटे दूर थाय छे; साचुं सुख मळे छे.
दुन्यवी सुख माटे तो शास्त्रकार एम कहे छे के हकीकतमां तो तेनी सामग्री, संसारनां बधां दुःखोनुं मूळ छे. एटले, तेनाथी तो परिणामे जीव वधु दुःखी ज थवानो छे; सिवाय के एक वार दुन्यवी दुःखथी मुक्त कर्या पछी तेने धर्मनी सामग्री आपवामां आवे, धर्म समजाववामां-कराववामां आवे, अने तेना द्वारा साचुं सुख आपवामां आवे.
एटले, द्रव्य-करूणा पण भविष्यमां भाव-करूणाने लक्ष्यमां राखीने ज करवानी छे.
वस्तुतः आपणे हिंतचिंतक होवानी श्रद्धा ऊभी थाय... आपणा द्वारा अपाता धर्मना उपदेशने जीव स्वीकारे... अने धर्म-आचरण माटे अनुकूळता ऊभी थाय... तेना माटे ज द्रव्य-करूणा करवानी होय छे. (क्वचित् आपणा हैयाने निष्ठुर बनता अटकाववा माटे पण द्रव्य-करूणा उपादेय बने छे.)
प्रश्नकारना प्रश्नमां पण ‘साधर्मिक’नी ज वात केम छे ? मनुष्यमात्रनी केम नहीं ? कारण ए ज छे के साधर्मिकमां आगळनी भाव-करूणा सफळ बनवानी संभावना घणी मोटी छे. (तेनुं पण कारण ए छे के व्यवहारथी ते जीव साचो धर्म पामेलो ज छे.)जे भाव-करूणा माटे ज द्रव्य-करूणा करवानी छे, ते भाव-करूणाने ‘धूमाडो’ कहीने तेनी निंदा करीने द्रव्य-करूणाने ज उपादेय मानवी – ते जिनशासननुं घोर अज्ञान नथी ?
उपधानादि अनुष्ठानो, ए धर्मनी सामग्री छे... धर्ममां जोडावानुं माध्यम छे... केटलाय जीवो एना माध्यमे गुरु भगवंत साथे जोडाय छे, जिनवाणी सांभळे छे, धर्म समजे छे, पामे छे, आराधे छे... यावत् दीक्षा पण ले छे...
तेमां थता खर्चने ‘धूमाडो’ कहेवो, ते तो नास्तिकतावादनुं अनुकरण छे... सुधारा(बगाडा ?)वादी बुद्धिजीवीओनी वकीलात छे.
धर्मसामग्री, धर्मनी समजण वगेरे आपवा रूप भाव-करूणानी निंदा करीने मात्र दुन्यवी सुख-सामग्री आपवी, ते तो हकीकतमां जीवना राग-द्वेषादि दोषो वधारीने अनंत काळ सुधी दुःखी करवानुं काम छे. ते देखीती रीते धर्म लागतो होय, तो य अनुबंधमां धर्म नथी.
हा, भाव-करूणा साथे यथायोग्य द्रव्य-करूणा पण उपादेय छे ज – एमां प्रश्न नथी. द्रव्य-करूणानी सर्वथा उपेक्षा पण योग्य तो नथी ज... पण भाव-करूणाने धर्म रूपे ज नहीं समजनार तो हकीकतमां जिनशासनने समज्यो ज नथी – एमां प्रश्न ज नथी.
जे जीवो भाव-करूणाने योग्य ज नथी, तेवा पशु-पक्षी वगेरे पर द्रव्य-करूणा ज करी शकाय छे. ते आपणा हैयाने कठोर बनता रोकवा-कोमळ बनाववा माटे छे... तेनाथी शासन-प्रभावना पण थाय छे...
Article written by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.

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