स्वसमयप्रज्ञापक...

उपदेश पदमां, आज्ञायोग पर अत्यंत भार मूक्यो छे. बधा ज उपदेशमां अंते ‘आज्ञायोग ज सारभूत छे’ – तेवुं पुनः पुनः प्रतिपादन कर्युं छे.
ए आज्ञायोग जाणवानो कोनी पासे ? तो जणाव्युं छे – गीतार्थ गुरु पासे.
ए गुरु केवा होवा जोइए ? तेना उत्तरमां घणा विशेषणो जणाव्या छे, तेमां एक छे – स्वसमयप्रज्ञापक. ए विशेषण पर केटलीक विचारणा प्रस्तुत छे.
शुं एनो अर्थ ए थाय, के गुरु परसमयनी प्रज्ञापना न ज करे ?
एवो तो न ज करी शकाय, कारणके स्वसमयनी सिद्धि माटे परसमयनुं खंडन, अने तेना माटे परसमयनी प्रज्ञापना पण करवी तो पडे ज.
एटले आ विशेषणनुं तात्पर्य आ छे 🡺
1. गुरु प्रधानपणे स्वसमयनी ज प्ररूपणा करे.
2. परसमयनी प्ररूपणा, बे कारणे करे 🡺
a. खंडन माटे.
त्यां तो तेनुं परसमय रूपे ज स्थापन होय – ते स्वाभाविक छे.
b. स्वसमयना पदार्थनी पुष्टि माटे.
त्यां पण ‘पदार्थ स्वसमयनो ज छे, ते ज वात परसमयमां पण कही छे’ – ए रीते प्ररूपणा होय.
एटले,
a. पदार्थनी सिद्धि तो स्वसमयथी ज थाय.
परसमय, कोइ पदार्थनी सिद्धि करवा स्वतंत्र रीते सक्षम नथी, स्वसमयथी निरपेक्ष रीते प्रमाणभूत ज नथी.
b. परसमयनी प्ररूपणा, तीर्थान्तरीयैः अपि उक्तं.. उक्तं चान्यैः अपि.. ए रीते ज होय.‘शास्त्रमां कह्युं छे..’ के ‘शास्त्रकारे कह्युं छे..’ ए रीते नहीं, कारणके परसमय ए ‘शास्त्र’ नथी.
(कारणके आप्तनुं वचन ए ज शास्त्र छे, अने संविग्न-गीतार्थ ए ज आप्त छे.)
परसमयमां तेमनी परिभाषाथी कोइ पदार्थनी प्ररूपणा होय, तो ते स्वसमयनी परिभाषाने प्रधान राखीने, तेने संगत थाय, ते रीते ज तेनी प्रज्ञापना कराय.
स्वसमयनी परिभाषानो पदार्थ बाधित थाय, ते रीते परसमयनी परिभाषाना पदार्थनी प्ररूपणा न कराय.
अहीं ए पण ध्यानमा राखवुं के सांख्यादि दर्शनना ग्रंथो जेम परसमय छे, तेम दिगंबरादि मतना ग्रंथो पण परसमय ज छे.
एटले समयसार वि. ग्रंथोने ‘शास्त्र’ कही शकाय नहीं.. ते ग्रंथथी (स्वसमयथी निरपेक्ष रीते) कोइ पदार्थ सिद्ध थइ शके नहीं.. अने एटले ते ग्रंथोना आधारे व्याख्यानादि करवा पण उचित नथी..
प्रश्न : अन्य दर्शनमां पण स्वसमयने अनुसारी होवाथी जे पदार्थ आपणने स्वीकार्य छे, तेना पर व्याख्यान करवामां शो वांधो ?
उत्तर : ‘स्वसमयने अनुसारी होवाथी मान्य छे..’ तेवो निर्णय, तमे जे स्वसमयना आधारे कर्यो, ते स्वसमयना आधारे ज व्याख्यान करवामां शी आपत्ति छे ? के परसमयना आधारे व्याख्यान करवुं ?
स्वसमयनो आधार लइने व्याख्यान कराय, तेनी पुष्टिमां ‘परसमयमां पण आम कह्युं छे..’ एवुं कही शकाय छे.. तेमां स्वसमयनी प्रधानता जळवाय छे.. ‘स्वसमय निरपेक्ष प्रमाणभूत छे.. अने परसमय, तेने सापेक्ष रहीने ज प्रमाणभूत छे..’ ए वात श्रोताने हृदयस्थ थाय छे, रहे छे.
प्रश्न : पदार्थ जो मान्य ज होय, तो परसमयने आधार बनावीने व्याख्यान करवामां वांधो शो छे ?
उत्तर : परसमय, ते ग्रंथ के ग्रंथकार माटे ‘ते निरपेक्ष प्रमाणभूत छे’ एवी श्रोताने मिथ्या प्रतीति थवानी संभावना – ए ज वांधो छे.
आवा कारणथी ज, अन्यतीर्थिकना कबजामां रहेल जिनप्रतिमाने वंदनादिनो निषेध छे ने ?
ए ज प्रतिमा, आपणा कबजामां होय, तो वंदनीय छे.. बीजाना कबजामां होय तो वंदनीय नथी..
ए ज रीते, ‘एक ज पदार्थ, स्वसमयना वाक्योथी प्रज्ञापनीय छे.. परसमयना वाक्योथी प्रज्ञापनीय नथी..’ एवुं कही ज शकाय छे.
हा, स्वसमयथी प्रज्ञापना कर्या पछी, तेनी पुष्टि माटे परसमयना वाक्यो कहेवानी ना नथी ज.
समयसारादि परसमयना ग्रंथो पर व्याख्यान न करवानुं एक कारण ए पण छे ज, के तेमांनां बधां वचनो आपणने मान्य नथी..
‘ग्रंथ’ पर व्याख्यान कराय, त्यारे श्रोताने तो ते ‘शास्त्र’ अने ‘सर्वांशे प्रमाणभूत..’ एवी ज प्रतीति थाय.. ते शी रीते उपादेय मनाय ? श्रोता ते ग्रंथ वांचवा ललचाय.. ‘आमां शुं स्वसमयमान्य छे ? शुं नथी ?’ ते विवेक करवानी प्रज्ञा न होय.. तेथी मिथ्या मान्यता सत्य तरीके पकडाइ जाय.. ए शुं संभवित नथी ?
(अन्यतीर्थिकना कबजामां रहेल प्रतिमानी वंदनीयतानो निषेध एटले ज छे ने ? के तेम करवाथी अन्यतीर्थिकना स्थानमां जवानो व्यवहार प्रवर्ते.. अने तेथी त्यां गयेला पछी अवीतरागने पण देवरूपे पूजे..)
एटले, जो स्वसमयानुसारी पदार्थ ज कहेवो छे, तो स्वसमयनो ज आधार लेवो उचित छे.
प्रश्न : प्रभुए ज कहेली, पण आपणी पासे न बचेली (लुप्त थयेली) निश्चयनयनी मान्यताओ समयसारादि दिगंबर ग्रंथोमां छे – एटले तेमना आधारे व्याख्यान करवामां वांधो शुं छे?
उत्तर : जे पदार्थो आपणा ग्रंथोमां नथी, अने समयसारादि ग्रंथोमां छे.. तेना माटे बे मुख्य संभावना छे 🡺
a. आपणने ते अमान्य छे.
b. आपणे त्यां लुप्त थया छे.
समयसारादि ग्रंथोना निश्चय नयना पदार्थो, यथातथ तो आपणने मान्य नथी ज – एमां कोइ संदेह नथी. महो. यशोवि. म. ए, अध्यात्म-मत-परीक्षा, द्रव्य-गुण-पर्यायनो रास, द्वात्रिंशद् द्वात्रिंशिका वगेरे अनेक ग्रंथोमां आ ग्रंथोना पदार्थोनुं आकरुं खंडन कर्युं छे.
(आ विशे एक वात खास करीश.. आ ग्रंथोना वांचन वखते एवुं अनेक वार अनुभवायुं छे के जे वात शास्त्रकार पूर्वपक्ष रूपे मूकी रह्या होय, ते वर्षोथी आपणी ज मान्यता होय.. पण शास्त्रकारे तेनुं खंडन कर्युं होय.
अर्थात् घणी बधी दिगंबर मान्यताओ, जे श्वेतांबर संप्रदायने मान्य नथी, ते श्वेतांबर संप्रदायमां घूसी गयेली छे.
जेम के, अति प्रचलित मान्यता छे के केवलिने इच्छा न होय. महो. यशोवि. म. ए तेने दिगंबरोनो कुतर्क कहीने तेनुं सामाचारी प्रकरण गाथा- ९१ नी टीकामां खंडन करेलुं छे.)
एटले, आ ग्रंथोना पदार्थो यथातथ तो मान्य नथी ज. तो पछी, तेमांनो कोइपण पदार्थ, स्वसमयने मान्य छे - तेवो चोक्साइपूर्वकनो निर्णय कर्या विना, तेनी प्ररूपणा शी रीते थइ शके ?
अने तेवी चोक्साइ करवा माटे पर्याप्त दार्शनिक अभ्यास जोइए.. विशेषथी जेमां ते पदार्थोनी चर्चा होय, तेवा ग्रंथोनो..
दिगंबर मतनुं खंडन जे ग्रंथोमां छे (अध्यात्म-मत-परीक्षा, द्रव्य-गुण-पर्यायनो रास, द्वात्रिंशद् द्वात्रिंशिका वगेरे); तेनो तलस्पर्शी अभ्यास अने दृढ स्मृति विना, दिगंबर ग्रंथमांना कोइपण पदार्थने स्वसमयमान्य मानी लेवो, ते दुःसाहस ज थशे.
आ ग्रंथो में जोया छे. एना आधारे एटलुं कहीश के समयसारादि ग्रंथमां कहेल निश्चय नयनो कोइ पदार्थ, जो स्वसमयना ग्रंथोमां न मळतो होय, तो ९०% के ९९% संभावना ए छे के ते स्वसमयानुसारी न होय.
तर्को बधा एक साथे संकळायेला होय छे. केटलीक वातोनुं खंडन आपणा पूर्वाचार्योए कर्युं छे, तो बाकीनी वातो मिथ्या होवानी कल्पना करवी ज वधु उचित छे.
में तो एवुं अनुभव्युं छे के श्वेतांबर ग्रंथोमां न मळती दिगंबरोनी मान्यताओ साची मानी लेवाय, तो परिणामे केवलिभुक्ति नहीं मानवानी आपत्ति आववी लगभग अपरिहार्य छे; कारणके तेमनी बधी मान्यताओ लगभग एमांथी ऊभी थयेली छे. (जुओ अध्यात्म-मत-परीक्षा)
आ बधानो सार एटलो ज छे के स्वसमयमां न मळता पदार्थो समयसारादि ग्रंथोमां मळे, तो ते स्वसमयविरोधी होवानी ज कल्पना करवी उचित छे.. आपणे त्यां लुप्त थया छे – तेवुं मानवाने बदले, आपणा पूर्वाचार्योए ते पदार्थोने प्रयत्नपूर्वक दूर राख्या – तेवु मानवुं ज उचित छे..
दिगंबरो पोते एवुं माने छे, के प्रभुनां वचनो बधां लुप्त थइ गया छे.. तेमना कुंदकुंदाचार्य वगेरेए स्वबुद्धिथी समयसारादि ग्रंथो बनाव्या छे..
ज्यारे तेओ ज एवुं मानता नथी के तेमनी पासे प्रभुनी मूळ परंपरा छे, त्यारे ‘प्रभुनां वचनोनी परंपरा आपणे त्यां लुप्त थइ गइ अने तेमने त्यां बची गइ..’ एवुं आपणे शा माटे मानवुं जोइए ?
साथे एक वात करी दउं 🡺
द्रव्यानुयोगना विषयमां, कोइ पदार्थ परंपराथी न मळ्यो होय, तो तेनी कल्पना करी शकाती नथी. दा.त. कोइ विमाननी ऊंचाइ जणावी न होय, तो कल्पना न थइ शके.
पण, चरणकरणानुयोगमां कोइ विषयनो पदार्थ परंपराथी न मळ्यो होय, तो पण तर्कादिना बळे निश्चित करी ज शकाय छे; कारणके तह तह पयट्टियव्वं.. दोसा जेण निरुज्झंति.. वगेरे शास्त्रवचनो द्वारा, निर्णय करवानी दिशा शास्त्रकारोए आपी ज छे.
आवुं मानवुं जरूरी छे, नहीं तो मोक्षमार्गनो ज उच्छेद थतां, तीर्थनो उच्छेद थाय, जे मानी शकातो नथी.
एटले, मानी ज लइए के वच्चेना विषम काळमां आपणे त्यां कोइ पदार्थनी परंपरा लुप्त थइ गइ होय.. तो पण, ते पछी थयेला ज्ञानी पूर्वाचार्योए तर्कादिना बळे तेने पुनर्जीवित करी ज होय.
सेंकडो ग्रंथो लखनारा पूर्वाचार्योनी प्रज्ञा तेवी निर्मळ अने सूक्ष्म हती ज.
एटले मोक्षमार्गमां आवश्यक एवा चरणकरणानुयोगना कोइ पदार्थनी परंपरा आपणे त्यां सर्वथा लुप्त थइ गइ होवानुं मानी शकाय तेम ज नथी.
बीजी एक वात 🡺
में समयसारादि बधां ग्रंथो जोया नथी.
((मारे जोवानी जरूर पडी नथी. अने जोवानी इच्छा पण नथी, सिवाय के तेनुं खंडन करवा माटे जोवानुं आवे. आपणा पूर्वाचार्योए रचेला ग्रंथोना अभ्यास अने वडीलो पासेथी मने जे मोक्षमार्ग समजवा मळ्यो छे, तेमां मने कोइ अधूराश देखाती नथी, के जेना माटे मारे बीजे नजर दोडाववी पडे.)
पण, एवुं जाण्युं छे के तेमां प्रधानपणे आत्मा अंगे निश्चय नयनी वातो छे, निश्चय नयथी धर्म (मोक्षमार्ग) शुं छे ? ते वातो नथी. (अथवा अल्प प्रमाणमां छे.)
आ बे निश्चय नयनी भेळसेळ करवाना कारणे ज कानजीभाइ जेवा कुपंथो ऊभा थया छे, जेने निश्चय-व्यवहार पुस्तकमां पू. भुवनभानुसू. म. ए ‘शंभुमेळो’ कह्यो छे.
आपणे निश्चय नयथी मोक्षमार्ग शुं छे ? ते अवश्य जाणवुं जोइए.. (अने ते शास्त्रकारोए तह तह पयट्टियव्वं.. दोसा जेण निरुज्झंति.. वगेरे द्वारा बताव्युं ज छे.) पण, दुनियानी दरेक वस्तु, निश्चय नयथी केवी छे ? ते जाणवानी अनिवार्य जरूर नथी.
जेम के, विमानोनी ऊंचाइनुं ज्ञान न होवाथी मोक्ष अटकी नथी पडवानो. (एवो अभ्यास न ज करवो – तेवुं कहेवानो आशय नथी, पण ए अनिवार्य तो नथी ज.)
आ वात नीकळी ज छे, तो ए पण जणाववुं जरूरी लागे छे के जे पदार्थ मोक्षमार्ग माटे जरूरी नथी, अत्यंत उपयोगी पण नथी, तेवो पदार्थ जाणतां होवा छतां, तेनुं निरूपण आपणा पूर्वाचार्योए ग्रंथमां न कर्युं होय – ते पण संभवित छे. (कारणके पदार्थो अपरिमित छे, ग्रंथो सीमित छे.)
एटले, स्वसमयने अविरुद्ध एवी कोइ वात परसमयमां होय, स्वसमयमां न होय, तो एवुं संभवित छे के ए मोक्षमार्गमां अल्प उपयोगी के निरुपयोगी होय.
Article written by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.

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