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द्रव्य-व्यवस्था...

Sep 28
2 min read
क्या बिना आंतरिक भाव के क्रिया व्यर्थ है? पूज्य भव्यसुंदरविजयजी महाराज साहेब 'मिठाई और मिठास' के सुंदर दृष्टांत से समझाते हैं कि कैसे निश्चय और व्यवहार एक-दूसरे के पूरक हैं और मोक्ष मार्ग के लिए अनिवार्य हैं


  • दान के रूपमें प्राप्त (या धार्मिक सम्पत्तियों से आय रूप में प्राप्त) धार्मिक संपत्ति की व्यवस्था किस प्रकार करनी चाहिए ? इसकी एक सुदृढ़ व्यवस्था जिनशासन में है, जो अन्य किसी भी दर्शन में देखने को नहीं मिलती।

    अन्य दर्शनों में मंदिरों में आने वाली दान-पेटियों की आय के मालिक, मंदिर के मालिक या पुजारी बन जाते हैं... और मंदिर को अपने जीवन-निर्वाह (या ऐशो-आराम) का साधन बना देते हैं।

    लेकिन जिनशासन में एक अटूट सिद्धांत है – जिस कार्य के लिए दान प्राप्त हुआ हो, उसी (या वैसे ही) कार्य में ही उसका उपयोग किया जा सकता है।

    जिसके प्रति भक्ति-भावना से दानदाता ने दान दिया हो, उसके लिए ही उसका उपयोग किया जा सकता है।

    इसलिए, प्राप्त दान को खातों में बाँटा जाता है।

  • प्रभु की भक्ति के लिए दिए गए दान का उपयोग प्रभु की भक्ति (जिनालय, प्रतिमाओं, उनकी पूजा, मरम्मत, देखरेख आदि) में ही किया जा सकता है। इसे "देवद्रव्य" कहा जाता है।

  • ज्ञान के प्रति भक्ति से दिए गए दान का उपयोग ज्ञान के कार्यों (ग्रंथों के लेखन, मुद्रण, संरक्षण आदि) में ही किया जा सकता है। इसे "ज्ञानद्रव्य" कहा जाता है।

  • साधु-साध्वियों की भक्ति के लिए दिए गए दान का उपयोग उनकी भक्ति (उनके आहार, पानी, वस्त्र, पात्र, औषध, चिकित्सा आदि) में ही किया जा सकता है।

    इसे "वैयावच्चद्रव्य" कहा जाता है।

  • श्रावक-श्राविकाओं की आराधना में सहायक बनने के लिए दिए गए दान का उपयोग आराधना की सामग्री (उपाश्रय, उपकरण, पाठशाला आदि) में ही किया जा सकता है।

  • गरीब और दुःखी मनुष्यों के प्रति करुणा से दिए गए दान का उपयोग उनकी सहाय (भोजन, दवा आदि) में ही किया जा सकता है। इसे "अनुकंपाद्रव्य" कहा जाता है।

  • अबोल पशु-पक्षियों के प्रति दया से दिए गए दान का उपयोग उनकी दया (चारा, पानी आदि के रूप) में ही किया जा सकता है। इसे "जीवदया-द्रव्य" कहा जाता है।

  • सामान्य से एक खाते का द्रव्य दूसरे खाते में नहीं ले जा सकते हैं, ना ही लिया जाता है ।

  • इसी नियत व्यवस्था के कारण, जिनालय सैकड़ों वर्षों तक सुरक्षित रहे हैं... हज़ारों ग्रंथ भी सैकड़ों वर्षों तक संरक्षित रहे हैं... थोड़ी सी संख्या के ही जैन, करोड़ों-अरबों का जीवदया आदि कार्य करते हैं। लगभग कोई दुरुपयोग या भ्रष्टाचार नहीं होता। ऐसी सुव्यवस्थित प्रणाली का अंशमात्र भी अन्य दर्शनों में देखने को नहीं मिलता।

  • जिन ज्ञानियों ने जिनशासन में यह अद्भुत व्यवस्था प्रस्तुत की है, उन्हें नमन करने का मन हो उठता है...


अहो ! श्रामण्यम् !... अहो ! जिनशासनम् !


Article written by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb for E-magazine Faithbook.

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