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प्रायश्चित्त व्यवस्था...

Aug 17
2 min read

Updated: Aug 26

क्या बिना आंतरिक भाव के क्रिया व्यर्थ है? पूज्य भव्यसुंदरविजयजी महाराज साहेब 'मिठाई और मिठास' के सुंदर दृष्टांत से समझाते हैं कि कैसे निश्चय और व्यवहार एक-दूसरे के पूरक हैं और मोक्ष मार्ग के लिए अनिवार्य हैं


  • परमात्मा के शासन की एक कम प्रसिद्ध लेकिन अद्भुत विशेषता है 🡺 प्रायश्चित्त की व्यवस्था।

    पापों के प्रायश्चित्त को बताने वाले विशेष (Special) ग्रंथ जिनशासन में उपलब्ध हैं, जो हज़ारों श्लोकों के प्रमाण में हैं।

    उनमें वर्णित कुछ खास विशेषताओं को संक्षेप में देखते हैं 🡺


  1. पाप करने के कारण के आधार पर प्रायश्चित्त का भेद

    पाप किन कारणों से होता है – यह जिनशासनमें विस्तृत रूप से बताया है।

    मुख्यतः पाँच कारण बताए गए हैं 🡺 अनाभोग (अज्ञान), सहसात्कार (अचानक हो जाना), प्रमाद (आलस्य, सुखप्रियता आदि), दर्प (लापरवाही-कठोरता) और आकुट्टि (जानबूझकर विरोध, विद्रोह)

    एक ही पाप यदि अलग-अलग कारणों से हुआ हो, तो उसका प्रायश्चित्त भी अलग-अलग होता है।

    (अपवाद तो पाप ही नहीं माना जाता।)

  2. पाप करने वाले व्यक्ति के आधार पर प्रायश्चित्त का भेद

    पाप करने वाले की उम्र (बालक, युवा आदि), पद (आचार्य, मुनि आदि), ज्ञान आदि के आधार पर भी प्रायश्चित्त बदलता है।

  3. पाप कितनी बार किया गया – उसके आधार पर प्रायश्चित्त का भेद

    पहली बार पाप करने पर जो प्रायश्चित्त दिया जाता है, दूसरी या तीसरी बार वही पाप करने पर अधिक कठोर प्रायश्चित्त दिया जाता है, क्योंकि जिसकी परिणति कठोर हुई हो, वही बार-बार पाप करता है।

  4. प्रायश्चित्त करने की शक्ति के आधार पर प्रायश्चित्त का भेद

    एक ही पाप के लिए, कमजोर व्यक्ति को छोटा प्रायश्चित्त दिया जाता है, जबकि सक्षम व्यक्ति को अधिक कठोर प्रायश्चित्त।

    ऋतुओं के अनुसार भी प्रायश्चित्त बदलता है – जैसे, शीतकाल में एक ही पाप का  प्रायश्चित्त  जो दिया जाता है, उसी पाप का प्रायश्चित्त गर्मी में कम दिया जाता है; क्योंकि गर्मी में तप कठिन होता है ।

  5. पश्चात्ताप की तीव्रता के अनुसार प्रायश्चित्त का भेद

    तीव्र पश्चात्ताप हो, तो प्रायश्चित्त कम दिया जाता है।

    कम पश्चात्ताप हो, तो प्रायश्चित्त अधिक दिया जाता है।

  6. प्रायश्चित्त देते वक्त व्यक्ति के आत्महित का लक्ष्य रखा जाता है

    जैसे कि एक ही पाप के लिए, बच्चे को – "गाथा कंठस्थ करने", श्राविका को – "सामायिक करने", और वृद्ध को – "जप करने" का प्रायश्चित्त दिया जाता है।

    अर्थात्, ऐसा प्रायश्चित्त दिया जाता है जिससे पाप का पश्चात्ताप तो हो ही,  साथ में धर्म में वृद्धि भी हो।

  7. पाप करते समय की परिणति के अनुसार प्रायश्चित्त भेद

    यदि तीव्र रस से पाप हुआ हो – तो प्रायश्चित्त अधिक दिया जाता है।

    यदि अल्प रस से पाप हुआ हो – तो प्रायश्चित्त कम दिया जाता है।

  8. पाप जाहिर में हुआ या एकांत में – उस आधार पर प्रायश्चित्त का भेद

    जैसे यदि जाहिर में झगड़ा हुआ हो, तो जाहिर में क्षमा याचना आवश्यक मानी जाती है।

  9. पाप के विषय के अनुसार प्रायश्चित्त का भेद

    देखने में एक जैसे पाप का विषय भिन्न हो, तो भी प्रायश्चित्त भिन्न दिया जाता है। जैसे कि परस्त्रीगमन (व्यभिचार) पाप है। लेकिन यदि वह कुलटा स्त्री के साथ किया हो, सुशील स्त्री के साथ किया हो, या राजा की रानी के साथ किया हो...

    तो इन सभी में प्रायश्चित्त अलग-अलग होता है। क्योंकि इन सभी के सामाजिक प्रभाव भिन्न-भिन्न होते हैं।

    परमात्मा का शासन की यह रोमांचक विशेषता हमें उस पर फीदा कर देती है ।

    अहो ! जिनशासनम् !


अहो ! श्रामण्यम् !... अहो ! जिनशासनम् !


Article written by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb for E-magazine Faithbook.

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