संवत्सरी - क्षमापना पर्व...

वर्तमान विश्व की जनसंख्या लगभग ७०० करोड़ कही जाती है। उनमें से ऐसे कितने व्यक्ति होंगे, जिनके साथ आपका मनमुटाव हो सकता है ?
❖ ७०,००० के अतिरिक्त तो शायद कभी संपर्क में भी नहीं आए होंगे।
❖ ७००० से अधिक लोगों से तो शायद पहचान भी नहीं होती।
उनमें से ७० लोगों के साथ मनमुटाव की संभावना होती है – परिवार, पड़ोसी, नौकर-चाकर, स्वजन, मित्र, साथ में आराधना करने वाले....
इन्हीं ७० लोगों से क्षमापना करना कठिन है बाकी के ६९९ करोड़ ९९ लाख ९९ हजार ९३० लोगों से क्षमाप करना शायद सरल है।
किंतु यदि उन ७० लोगों से ही क्षमापना न करें, तो?
तो कल्पसूत्र (बारसासूत्र) में शास्त्रकार लिखते हैं 🡺 जो ण उवसमइ, तस्स नत्थि आराहणा...
जो संवत्सरी के दिन भी कषाय को शांत नहीं करता, उसकी बाकी कोई भी आराधना, आराधना नहीं रहती – वह एक के बिना शून्य बन जाती है।
जो साधु, बड़ों के समझाने पर भी संवत्सरी प्रतिक्रमण से पहले कषाय का शमन नहीं करता, उसके लिए शास्त्रकार आज्ञा करते हैं 🡺 से णं णिज्जूहियव्वे सिया... उसे गच्छबाहर (या संघबाहर) कर देना चाहिए।
आजकल, श्रावकों को संघबाहर करने की कोई व्यवस्था नहीं है। किंतु यदि हम क्षमापना नहीं करते, तो हम स्वयं ही अपने आप को संघबाहर कर लेते हैं।
ये शब्द कल्पसूत्र में हैं, वे भद्रबाहुस्वामी के नहीं हैं। उन्होंने अंत में बताया है –
यह सब स्वयं प्रभु वीर ने कहा है।
इसलिए, ये प्रभु वीर के शब्द हैं।
आइए, परमात्मा का शासन प्राप्त होने को सार्थक करें...
वे कौन ७० लोग हो सकते हैं जिनसे हमारा मनमुटाव हुआ हो ? उनकी एक सूची बनाएँ...
सभी से क्षमापना करें... संभव हो तो रूबरू मिलकर... संदेश द्वारा या अंततः केवल अंतःकरण से...
और यह केवल ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ शब्द न हों... अंतर में यह भाव हो – ‘मैंने कषाय किया, यह मेरी ही भूल है... मुझे इसके लिए क्षमा याचना करनी है... दूसरे ने कर्मवश कुछ किया हो, तो उसे भूल जाना है...’
इस क्षमापना के पश्चात् ही संवत्सरी प्रतिक्रमण करें... तब यह केवल एक क्रिया नहीं रहेगी, बल्कि भावपूर्वक क्रिया बन जाएगी... जिसकी शक्ति करोड़ों-अरबों गुना बढ़ जाएगी।
करेंगे ना ?
Article written by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.

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