प्रभु वीर का जन्म वांचन...

पर्युषण महापर्व में प्रभु वीर के जन्म वांचन का महत्त्व अद्वितीय है...
जिनशासन का बच्चा-बच्चा तब उपाश्रय में उपस्थित होता है...
‘आरोग्यवंत ऐसी त्रिशला माता ने, आरोग्यवंत ऐसे पुत्र को जन्म दिया...’ इन शब्दों को सुनते ही
मानो तीनों लोकों का राज्य मिल गया हो, ऐसे उसका रोम-रोम झंकृत हो उठता है...
इन शब्दों का उच्चारण करने वाले गुरु भगवंत क्या रोमांच अनुभव करते हैं, वह तो शब्दातीत है...
इस दिन हम किन भावों को उजागर करें ?
1. जिस संपत्ति के पीछे सारी दुनिया पागल होकर दौड़ती है... जैन भी जिसके लिए दिन-रात,
खून-पसीना एक करते हैं... इस दिन क्या होता है! पता नहीं, जैन साँप की केंचुली की तरह
उसे छोड़ते हुए दिखाई देते हैं...
अहा ! क्या है उनका प्रभु के प्रति यह उमड़ता हुआ प्रेम ! क्या है उनकी श्रद्धा ! क्या है उनकी भक्ति !
यह देखकर हमारी आँखें हर्षाश्रुओं से छलक उठती हैं... हृदय गदगद हो जाता है...
वाणी निःशब्द हो जाती है...
सम्यग्दर्शन की विशुद्धि के लिए यह एक अनुपम पर्व है, एक अनूठा अवसर है... इसे हम अंतर्मन से अनुभव करें...
2. तीर्थंकर परमात्मा का कैसा अचिन्त्य पुण्य है ?
जन्म के समय तो वे तीनों लोकों को आनंदित करते हैं... दुकाल को सुकाल में बदल देते हैं...
खारे पानी को मीठा कर देते हैं... धरती को हरी-भरी कर देते हैं...
परंतु उनके २५०० वर्षों के बाद भी, उनके जन्म का केवल वांचन ही प्रत्येक जैन के अंतर्मन को
आनंद से भर देता है... और यह परंपरा अभी १८५०० वर्षों तक चलती रहेगी...
3. परमात्मा के इस प्रकृष्ट पुण्य को जन्म देने वाली है - मैत्री भावना...
‘जो होवे मुज शक्ति इसी, सवि जीव करुं शासन रसी...’ हम इस नाद को अपने हृदय में गुंजायमान करें...
मुझे मिला हुआ और मुझे प्रिय यह प्रभु का शासन (प्रभु द्वारा दिखाया गया शाश्वत सुख का मार्ग) प्रत्येक
जीव तक पहुँचाना है... प्रत्येक को प्रिय करवाना है...
आइए, इन तीन भावों से अपने अंतर्मन को प्लावित करें...
गुरु भगवंत के जन्म-वांचन के शब्द, हमारे हृदय में प्रभु का जन्म कराने वाले बन जाएँगे...
Article written by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.

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