top of page

विचार आत्मद्रव्यनो के पर्यायनो ?...

  • Jul 29
  • 2 min read

Updated: 6 hours ago

An illustration explaining the different perspectives of Naya in Jainism as taught by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.


अतत्त्व : अनंत काळमां अनंत वार आराधना करवा छतां मोक्ष नथी थयो, कारणके शुद्ध आत्मद्रव्यने जाण्युं नहीं, तेनो विचार कर्यो नहीं.


तत्त्व : आत्मद्रव्यनी पूर्वे जे ‘शुद्ध’ विशेषण लगाड्युं, तेनो अर्थ शुं ? ए पहेलां विचारीए.


  • शुद्धता अने अशुद्धता – ए बंने परस्परने सापेक्ष पदार्थ छे. अर्थात् जो दुनियामां क्यांक अशुद्धता होय, तो ज अन्यत्र क्यांक शुद्धता होवानुं कही शकाय.

  • जेम, एक माणसने ‘ऊंचो’ तो ज कही शकाय, जो बीजो माणस तेनाथी ‘नीचो’ होय. एटले, शुद्धता ए आत्मद्रव्यनी एक विशिष्ट अवस्था मानवी पडे, जे दुनियामां क्यांक रहेली बीजा आत्मद्रव्यनी (अथवा कोईक काळे रहेली पोताना आत्मद्रव्यनी) अशुद्धता रूप अवस्थाने सापेक्ष छे.अने अवस्था ए तो पर्याय छे, द्रव्य नहीं. द्रव्य तो सदा एकरूप होवाथी तेनी जुदी जुदी अवस्था ज होती नथी. एटले, हकीकतमां उपरोक्त विधाननो अर्थ ए थशे के आत्माना एक विशिष्ट पर्यायने जाण्यो नहीं, विचार्यो नहीं; तेथी मोक्ष थयो नहीं. अने ए वात साची छे. आत्मानी वीतराग अवस्थाने आपणे साची रीते जाणी नथी... ‘आत्मा वीतराग बनी शके’ तेवुं ज आपणे मान्युं नथी... अथवा ‘वीतरागतामां ज साचुं सुख छे... वीतराग आत्मा ज साचो सुखी छे...’ एवुं आपणे मान्युं नथी... अने तेथी आराधनामां वीतराग बनवानुं (राग-द्वेषना नाशनुं) लक्ष्य राख्युं नथी.. तेथी ज आपणो मोक्ष थयो नथी.

  • वास्तवमां द्रव्य तो सदा एक स्वरूप होवाथी, तेमां कंइ करी शकातुं ज नथी. तो तेना माटे शो पुरुषार्थ करवानो ?

  • जे कंइ करी शकाय छे, ते पर्यायमां ज करी शकाय छे; पर्यायने ज बदली शकाय छे. एटले पुरुषार्थ पर्यायने ज बदलवानो करवानो छे. राग-द्वेषादिथी मिश्रित अशुद्ध पर्यायने बदलीने तेनाथी रहित शुद्ध पर्याय लाववानो छे. तो तेना माटे विचार पण पर्यायनो ज करवानो होय – ‘कया राग-द्वेष मारा पर्यायने अशुद्ध करे छे ? केवी रीते तेने घटाडीने पर्यायनी अशुद्धता घटाडी शकाय ? अथवा तेनो नाश करीने पर्यायने शुद्ध करी शकाय ?’ एटले, मोक्ष माटे विचार आत्माना पर्यायनो ज करवानो छे, आत्मद्रव्यनो नहीं.

  • शास्त्रकारोए आराधनानुं एकमेव लक्ष्य राग-द्वेषनो नाश होवानुं बतावीने ए ज वात करी छे. वास्तवमां द्रव्यदृष्टि – मात्र द्रव्यना विचारनी वात, आत्माने एकांत नित्य माननारा सांख्य दर्शननी छे, जैन दर्शननी नहीं - एम पू. भुवनभानुसू. म. लखे छे.

  • कोइ कर्मरहित आत्मद्रव्यने शुद्ध कहेतुं होय तो, ते पण एक पर्याय ज छे. अने कर्मरहित थवा माटे, राग-द्वेषथी मुक्त थवुं अनिवार्य छे; कारणके राग-द्वेष ज कर्मबंधना कारण छे. पहेली वीतरागता आवे, पछी ज सर्व कर्मथी मुक्ति आवे छे.





Comments

Rated 0 out of 5 stars.
No ratings yet

Add a rating
bottom of page