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देह अने आत्मा : भेद के भेदाभेद ?...

  • Jun 30
  • 2 min read
An illustration explaining the different perspectives of Naya in Jainism as taught by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.


अतत्त्व : शरीरने आत्माथी भिन्न मानवुं - ए ज सम्यग् ज्ञान छे.


तत्त्व : जिनशासन स्याद्वादमय छे.ते देह अने आत्मानो भेद पण माने छे, अभेद पण माने छे...


  • भेद मानवो ते पण एक नय छे, अभेद मानवो ते पण एक नय छे... ज्यारे जे नयनी विचारणाथी आत्मानुं हित थतुं होय, ते नय विचारवानो होय छे.

  • कोइ आपणा शरीरने मारे, त्यारे एम विचारीए के 'ए क्यां मने (मारा आत्माने) मारे छे ? ए तो मारा शरीरने मारे छे... अने शरीर ए कंइ 'हुं' नथी...' तो मारनार पर क्रोध न आवे... आ रीते भेद विचारवाथी आत्मानुं हित थाय...

  • पण, कोइ बीजाने मारीने एम विचारे के 'में क्यां मार्युं ? ए तो मारा शरीरे तेने मार्युं... अने मारुं शरीर कांइ 'हुं' नथी...' तो एना आत्मानुं अहित थाय.. एटले, आवा अवसरे भेद नथी विचारवानो, अभेद ज विचारवानो छे - 'में ज मार्युं... पाप कर्युं... मारे एनुं प्रायश्चित्त करवुं जोइए...' तो ज आत्मानुं हित थाय...

  • कोई आपणा नामने गाळ आपे, त्यारे विचारवानुं छे के 'नाम तो शरीरनुं छे, आत्मानुं नथी.. अने शरीर क्यां 'हुं' छुं ? एटले ए मने गाळ नथी आपतो..' तो गाळ आपनार पर क्रोध न थाय.. आ रीते भेद विचारवाथी आत्मानुं हित थाय..

  • मारा गुरुदेव मने नामथी बोलावे, त्यारे एवुं विचारुं के 'नाम तो शरीरनुं छे.. मारुं नथी.. एटले मारे जवानी जरूर नथी..' तो मारा आत्मानुं अहित थाय.. एटले एवा अवसरे भेद नथी विचारवानो, अभेद ज विचारवानो छे - 'मने ज बोलावे छे..' अने जवानुं छे - आज्ञापालन करवानुं छे. तो ज आत्मानुं हित थाय.

भगवती सूत्रमां लख्युं छे के,

मात्र भेद मानवो, अभेद मानवो ज नहीं – ते तो एकांतवाद छे, मिथ्यात्व छे...

भेद-अभेद बंने मानवा – ए ज अनेकांतवाद छे... तेमां ज सम्यग्दर्शन छे...

  • भेदज्ञानने ज सम्यग् ज्ञान मानवुं - ते भ्रमणा छे, मिथ्यापंथोना प्रचारनी नीपज छे.





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