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उपाध्याय पद कोने अपाय ?

  • Jul 2
  • 2 min read
क्या मुक्त आत्माओं के दर्शन कहीं भी किए जा सकते हैं? पूज्य भव्यसुंदरविजयजी महाराज साहेब समझाते हैं कि अन्य धर्म के मंदिरों में अरिहंत प्रतिमा के दर्शन करने से सम्यक्त्व (Samyaktva) को क्या खतरा है और व्यवहार शुद्धि क्यों अनिवार्य है।


प्रश्न : उपाध्याय पद कोने अपाय ?

उत्तर :

प्रश्ननो उत्तर आपतां पहेलां एक वात जणावी दउं के प्रश्न पूछवा पाछळनो आशय सम्यग् होवो जोईए - जिनशासननी व्यवस्थाओ जाणीने तेना प्रत्ये श्रद्धा-आदर वधारवानो आशय होय... आराधको प्रत्ये बहुमान वधारवानो के तेमने सहायक थवानो आशय होय... पोताना जीवनमां आराधना वधारवानो आशय होय... तो ते सम्यग् छे.

ज्यां कोईकनी लीटी नानी करवानो आशय होय... कोईने अपात्र पुरवार करवानो आशय होय... कोईनी निंदा करवानो आशय होय... तो ए असम्यग् छे.

सम्यग् आशय जणाय, तो अमे उत्तर आपीए,

आशय जो असम्यग् होय, तो अमे उत्तर न आपीए. क्यारेक कशुं ज करवुं नथी होतुं, मात्र बुद्धिनी खणज होय छे. तेनो जवाब अमे न पण आपीए. एटले, पहेलां ए कहो के तमारे आ जाणीने शुं काम छे ? तमारे कोईने पद आपवानुं छे ? ए अधिकार तो मात्र आचार्य(गच्छाधिपति)नो छे, मारो पण नथी. तो ए जाणीने तमारे शुं काम छे ?


सभा : उपाध्याय पदनुं माहात्म्य शुं ? ए जाणवुं छे.

ए सारी वात छे. सामान्यथी पद, अधिकार साथे जोडायेलुं होय छे.

जेम के आचार्य पद, ए गच्छ पर अनुशासननो अधिकार आपे छे. (हकीकतमां पूर्वना काळे, एक गच्छमां एक ज आचार्य रहेता हता, अत्यारनी व्यवस्था बदलाई गइ छे.)

पंन्यास पद, ए सर्व शास्त्रोना व्याख्यान-विवेचननो अधिकार आपे छे.

उपाध्याय पद, साक्षात् कोई अधिकार आपतुं नथी, पण तमारी भाषामां तेओ आचार्यना डेप्युटी छे. आचार्यनी अनुपस्थिति होय, तो आचार्यना बधा अधिकार तेमने मळे छे. राजाने जेम युवराज होय, तेवुं उपाध्यायनुं स्थान छे.


सभा : तेओ सूत्रनी वाचना आपे – एवी वात आवे छे ने ?

हा, शास्त्रमां कह्युं छे – आचार्य अर्थनी वाचना आपे, उपाध्याय सूत्रनी वाचना आपे.

पण एनो अर्थ एवो नथी के आचार्य सूत्रनी वाचना न ज आपे के उपाध्याय अर्थनी वाचना न ज आपे. बंने, सूत्र-अर्थ बंनेनी वाचना आपवा सक्षम होय अने अवसर आवे तो आपे पण खरा.


आ एक सामान्य व्यवस्था छे के आचार्य अर्थनी वाचना आपे, उपाध्याय सूत्रनी. तेनुं सामान्य कारण ए छे के अर्थ, सूत्र करतां महान छे; एटले तेनी वाचना उपरना पद पर रहेला आचार्य आपे. वळी, अर्थनी वाचना, वधारे क्षयोपशम-अनुभव-चिंतन मांगे छे. अने सामान्यथी आचार्य, उपाध्याय करतां दीर्घपर्यायी–अनुभवी–क्षयोपशमवाळा होय; एटले तेओ अर्थनी वाचना आपे.





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