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गुरु कडक होय ते चाले ?

  • Jun 25
  • 2 min read
क्या मुक्त आत्माओं के दर्शन कहीं भी किए जा सकते हैं? पूज्य भव्यसुंदरविजयजी महाराज साहेब समझाते हैं कि अन्य धर्म के मंदिरों में अरिहंत प्रतिमा के दर्शन करने से सम्यक्त्व (Samyaktva) को क्या खतरा है और व्यवहार शुद्धि क्यों अनिवार्य है।


प्रश्न : गुरु कडक होय ते चाले ?

उत्तर :

पहेलां एक वात जणावी दउं के कडकाई अने उग्रता – ए बे जुदी वस्तु छे. तमे ए बेनी भेळसेळ करी नाखो छो. गुरु उग्र होय – ते अवगुण मानी शकाय; पण कडकाइ तो होवी ज जोईए, ते गुरुनो अनिवार्य गुण छे.

कडकाईनो अर्थ छे – नियंत्रणो-नियमो अने तेना पालननो चुस्त आग्रह.

समुदाय चलाववानो होय, त्यां नियमो जोइए ज; नहीं तो टोळुं बने, समुदाय नहीं.

अने नियमोनुं पालन, तेना आग्रह विना – सजाना भय विना थाय नहीं. तेना माटे कडकाई जरूरी छे. वर्षो पूर्वे एक वृद्ध श्रावके अनुभवनो निचोड कहेलो - ‘जे नियमना भंगनी कोई सजा न होय, ते नियम लांबो समय टके नहीं.’

शास्त्रमां पण कह्युं छे - गुरु ‘भीम’ अने ‘कांत’ बंने गुणोवाळा जोईए. कांतनो अर्थ छे – सौम्य, करुणावंत. करुणाथी गुरु शिष्योने उपदेश, हितशिक्षा, मार्गदर्शन आपे. शिष्य तेने स्वीकारे, पाळवा पण इच्छे. छतां अनादिना संस्कारवशात् क्यारेक अनुचित प्रवृत्ति करवानुं मन थइ जाय. त्यारे सजानो भय होय, गुरुनो भय होय, तो अटकी जाय. एना माटे गुरु ‘भीम’ होवा पण जरूरी छे. एटले ज, वीतराग एवा केवली भगवंतो शिष्योनुं योगक्षेम पोते नथी करतां, दीक्षा आप्या पछी शिष्य बीजा छद्मस्थने सोंपी दे छे; कारणके पोते वीतराग होवाथी ‘भीम’ बनी शकता नथी.

शास्त्रमां गुरुनी फरज बतावी छे – शिष्योना सारणा-वारणा-चोयणा-पडिचोयणा करवानी. ‘जे गुरु, शिष्योना सारणा-वारणादि न करे, तेनी निश्रामां रहेवुं नहीं’ एवुं शास्त्रकारोए कह्युं छे. आमां चोयणानो अर्थ ठपको छे, पडिचोयणानो अर्थ शिक्षा छे. ए बंने कडकाईरूप ज छे, जे गुरुनो अनिवार्य गुण छे.

प्रश्न : पण कडकाई करवा जतां उग्रता आवी न जाय ?

शिष्यना हित माटे कडकाई कराय, त्यारे बाह्य उग्रता देखाडवी पडे. तेना विना भय पेदा न थाय. एटलुं ज नहीं, कथंचिद् उग्रता आवी जाय, तो पण अंतरमां तो शिष्यनी हितबुद्धि रूप करुणा ज होवाथी ते दोषरूप नथी.

शास्त्रमां कह्युं छे – ‘शिष्य विनय-वैयावच्च न करतो होय, तो गुरु कठोर शब्दो कहीने पराणे पण करावे.’ पछी त्यां जणाव्युं छे के ‘कठोर शब्दो कहीश, तो मने द्वेष थशे...’ एवा भयथी गुरु सारणा-वारणादि न करे, तो शिष्योने अविनयी बनाववानो दोष तेमना माथे आवे. त्यां जणाव्युं छे के आवा अवसरे जो द्वेष जागे, तो पण ते प्रशस्त छे, मोक्षमां सहायक छे – प्रतिबंधक नथी. जेम राग प्रशस्त होय छे, तेम द्वेष पण प्रशस्त होय छे – एवुं त्यां स्पष्ट जणाव्युं छे. एटले गुरुमां कडकाई होवी तो अनिवार्य छे, तेनी साथे आंशिक उग्रता आवे, तो ते पण प्रशस्त छे. हवे एक प्रश्न करुं,

कडकाई जरूर करतां ओछी होय – ते सारुं ? के जरूर करतां वधु होय – ते सारुं ?

प्रश्नकार : प्रमाणसर होय, तो.

ते तो बराबर ज छे. पण गुरु पण छद्मस्थ छे. एकदम प्रमाणसरनी कडकाई होवी अत्यंत मुश्केल छे. कां थोडी वधु होय, कां थोडी ओछी होय. तो बे मांथी शुं वधारे सारुं ?

तेनो शास्त्रकारे जवाब आप्यो छे – ‘लाकडीथी मारनारा गुरु सारा, जीभथी चाटनारा गुरु नहीं.’ अर्थात् वधारे कडकाई सारी, वधारे वात्सल्य नहीं.


अलबत्त, वात्सल्य विनानी एकली कडकाई न ज चाले. तेने शिष्यो जीरवी न शके... माता-पिता-परिवारने छोडीने आवेल शिष्यने गुरुनी हूंफ तो जोईए ज.वात्सल्य होय, तो शिष्य समजे के ‘गुरु मारा हितमां ज कडकाई करे छे’, अने तेथी कडकाईने पचावी शके. अने वात्सल्य होय – ए पूरतुं नथी, शिष्योने ते अनुभवावुं पण जोईए. तो ज कडकाई जीरवी शकाय.





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