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मृत शरीर सामे मोटी शांति बोले छे – ते योग्य छे ?

  • May 28
  • 2 min read

Updated: Jun 2

क्या शव के सामने सूत्र पढ़ना चाहिए? पूज्य भव्य सुंदर सूरीश्वरजी महाराज साहेब आशुचि की जगह सूत्र पढ़ने की मनाही, दाह संस्कार के दौरान भगवान का नाम और वैराग्य की स्थिति पर मार्गदर्शन देते हैं 'देख तमाशा लकड़ी का'

प्रश्न: मृत शरीर सामे मोटी शांति बोले छे – ते योग्य छे ?

उत्तर : आपणे त्यां अशुचिस्थाने सूत्रो बोलवानी मनाई छे.


सभा : मृत शरीर अशुचि गणाय ?

हा. एटलेस्तो त्यारपछी स्नान करवानो व्यवहार छे. अने मृतने तो संभळाववानुं होतुं नथी. तो बोलीने शो फायदो ?


सभा : स्मशाने लइ जाय त्यारे पण ‘जय जिनेन्द्र – जय महावीर’ एवुं बधुं बोलाय छे.

ए पण उचित नथी. साधु भगवंतना काळधर्म पछी पण भगवाननुं नाम नथी बोलातुं, ‘जय जय नंदा...’ ज बोलाय छे.


सभा : श्रावक माटे तेवुं बोलाय ?

सामायिक-पौषधादि आराधनामां मृत्यु पामेला श्रावकनी पालखी काढी शकाय – तेवी आपणे त्यां परंपरा छे. ए वखते तेवुं बोलवानी परंपरा होय, तो वांधो नथी.


सभा : तो स्मशानयात्रामां शुं बोलवानुं ?

समग्र जैन समाज भेगो थइने नक्की करे के ‘मृतक सामे के स्मशानयात्रामां भगवाननुं नाम नहीं लेवानुं, सूत्रो नहीं बोलवाना...’ पछी वडील आचार्य भगवंतोनुं मार्गदर्शन लेवुं के ‘शुं बोली शकाय ?’ तेना घणा विकल्पो मळी शके.

गृहस्थपणामां एक अत्यंत वैराग्यप्रेरक हिंदी पद सांभळेलुं - ‘देख तमाशा लकडी का...’ एवुं कोई पद बोली शकाय.


सभा : एवी कोई सज्झाय बोलाय ?

जेमां भगवाननां/महापुरुषोनां नाम आवता होय, तेवुं तो नथी बोलवानुं. तेना विनाना कोई पद होय, अने वडील महापुरुषो कहे, तो बोली शकाय.


सभा : मृतकने प्रदक्षिणा आपे छे, ते योग्य छे ?

आपणा माटे पंच परमेष्ठी अने नवपद पूज्य छे. तेनी उपासना-पूजा छे. तेने प्रदक्षिणा आपी शकाय.

साधर्मिक अपेक्षाए पूज्य होवा छतां, तेने प्रदक्षिणा वगेरेनो व्यवहार नथी, अने करवो योग्य पण जणातो नथी. तो मृतकने पूज्य जेवो प्रदक्षिणानो व्यवहार केटलो योग्य गणाय ? अलबत्त, निश्चय नयथी सर्व आत्माओ सिद्ध परमात्मा तुल्य छे – अनंत गुणवान् छे; पण ते व्यवहारमां ऊतारवानुं नथी, नहीं तो कीडी-मंकोडाने के उंदर-बिलाडाने य प्रदक्षिणा आपवानुं उपादेय बनशे. अने मृतकमां तो आत्मा होतो पण नथी.


सभा : साधुना मृत शरीरने प्रदक्षिणा अपाय ?

एवो व्यवहार सामान्यथी देखातो नथी. छतां, साधुनुं शरीर होवाथी ते साधुनो द्रव्यनिक्षेप छे, एटले पूज्य छे. एटले, क्यांक तेवो व्यवहार होय, तो सर्वथा निषिद्ध नथी.





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