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धर्मनुं ओछामां ओछुं फळ मेळववा शुं जोईए ?....

  • Aug 8
  • 1 min read
શું થાળી ધોઈને પીવાથી આયંબિલ જેટલું પુણ્ય મળે? પૂજ્ય ભવ્યસુંદરસૂરીશ્વરજી મહારાજ સાહેબ સમજાવે છે 'થાળી ધોઈને પીવા' પાછળનું સાચું शास्त्रवचन અને હિંસાથી બચવાનો લાભ


जघन्य फळ मेळववा केवो भाव जोइए ? मुख्यपणे बे वस्तु जोइए.


  1. आराधना प्रत्ये अनादर न जोइए.


‘आवुं शा माटे करवानुं ?’ एवो तिरस्कारभाव होय... कर्या पछी ‘करवुं पड्युं’ तेनो अफसोस-बळापो होय... देव-गुरुनी अवहेलना-आशातना होय... तो जघन्य फळ पण न मळे, क्यारेक नुकसान पण थाय.

केटलीक वार कोइ पराणे-फरजीयात धर्म करावे, त्यारे आवा भाव संभवित होय छे.

सभा : तो ते रीते नहीं करवानुं ?

एवो नियम नहीं करवानो. ते-ते व्यक्ति अने ते-ते संयोगना आधारे निर्णय थाय.


  1. प्रतिज्ञानो भंग न जोइए.


सामायिक लीधा पछी मोबाइलथी रम्या करे... उपवासनुं पच्चक्खाण लइने मावो खाय... तो जघन्य फळ पण न मळे.


एटले सामान्य श्रद्धा-बहुमान साथे, प्रतिज्ञानुं स्थूल पालन होय,तेने पण जघन्य फळ मळे छे.



Extract from Book Samyaktva written by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.


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