निष्फळतानो अर्थ....
- Jul 25
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जे फळ माटे महेनत करी होय, ते फळ न मळे, तो ‘महेनत निष्फळ गइ’ एम कहेवाय छे. पण तेनो अर्थ ए नथी, के कोइ ज फळ नथी मळ्युं. जेना माटे महेनत करी हती, ते फळ न मळ्युं – ए ज तेनो अर्थ छे. तेना सिवाय बीजुं फळ मळ्युं होय – तेवुं संभवित छे ज.
३० मार्क लावनार छोकरो नापास भले थयो; ३० मार्क आव्या, ते बतावे छे के तेने कंइक तो आवड्युं छे.
तेना ज्ञानमां कंइक वृद्धि तो थइ ज छे.
तमे गाथा गोखवा माटे अडधो कलाक महेनत करी. कदाच गाथा न आवडी. तमारी महेनत सफळ कहेवाय के निष्फळ ?
तमे एम ज कहो छो के ‘अडधो कलाक महेनत करी, पण कांइ न आवड्युं’. महेनत निष्फळ गयानो अफसोस ज लगभग तमने थतो होय छे.
हकीकत ए छे के भले गाथा न आवडी होय, अडधो कलाक गोखवाना सम्यक् पुरुषार्थथी तमने कर्मनिर्जरा तो थइ ज होय छे.
ते फळ तो मळ्युं ज छे.
(खरेखर तो कर्मनिर्जरा ए ज अहीं मुख्य फळ छे. पण तमारा मनमां ‘गाथा आवडवी’ ए ज फळ मुख्यरूपे बेठुं होवाथी तमने महेनत निष्फळ लागे छे.)
Extract from Book Aaradhana Nu Fal written by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.

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