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द्वेष रागजन्य छे...

  • May 23
  • 1 min read
क्या आप जानते हैं कि द्वेष (Dvesh) असल में तीव्र राग (Intense Attachment) की निशानी है? P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb मोहनथाल और खिड़की के पवन के उदाहरण से समझाते हैं कि कैसे राग ही द्वेष को जन्म देता है


द्वेष ए तीव्र राग होवानो सूचक छे. दृष्टांतथी आ वात समजावुं.


मानी लो के मने मोहनथाळ पर राग छे. पातरामां आवे, अने वापरुं, तो राग थाय छे.

कोइ साधु गोचरीमां लाव्यो तेनी खबर पडवाथी ज जो आनंद थाय,

तो मानवुं पडे के रागनी मात्रा वधारे छे.

स्वामिवात्सल्यमां मोहनथाळ होवानी खबर पडवाथी पण आनंद थाय,तो समजवुं पडे के राग हजी वधारे छे.


में साधुने कह्युं होय – ‘मोहनथाळ मळे, तो लावजो.’ तेने मळवा छतां न लावे...

मने खबर पडे त्यारे तेना पर गुस्सो आवे, तो समजवुं पडे के राग घणो वधारे छे.


एटले द्वेष थवो, ते तीव्र रागनुं सूचक छे. सामान्य राग होय, तो द्वेष न थाय.

बारी खुल्ली होय, ठंडो पवन आवे, ते गमे छे – ते राग छे.

बारी बंध होय, अने पवन न आवे, तो राग न थाय; पण तेनाथी अकळामण थाय...

‘कोणे बंध करी ?’ तेना पर द्वेष थाय... तो तेनो अर्थ ए छे के राग तीव्र छे.


एटले द्वेषने ओछो नुकसानकारक न मानता.

द्वेषना कारणे नरकमां गयेला, पछी एकेन्द्रियमां अनंत काळ रहे – तेवुं बनी शके छे.



Extract from Book Bhavna Nu Mahatmya written by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.


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