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संप्रति महाराजा...

  • 3 days ago
  • 2 min read
An illustration explaining the different perspectives of Naya in Jainism as taught by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.


‘आ शेनां वाजां वागे छे ?’

कोलाहल सांभळीने राजाने जोवानुं कुतूहल थयुं.

आचार्य भगवंतनुं सामैयुं थइ रह्युं हतुं.

आचार्य भगवंतने जोतां राजाने लाग्युं के एमने क्यांक जोया छे... जातिस्मरण ज्ञान थयुं... पोताने पूर्वभवमां दीक्षा आपनार आ आचार्य भगवंत हता – ते ख्याल आव्यो. ए दीक्षाना प्रभावे ज पोते राजवैभव पाम्यो - ए समजायुं...

समग्र राजवैभव आचार्य भगवंतना चरणे धरी देवा तैयार थयो.

निष्परिग्रही–निःस्पृह आचार्य भगवंते पोते कशुं न लीधुं, पण जिनशासननी प्रभावनानो उपदेश कर्यो. ए राजाए अप्रतिम शासन-प्रभावना करी.


- आचार्य भगवंतनुं नाम – दश पूर्वधर आर्य सुहस्तिसू. म. सा...

- राजानुं नाम – सम्राट संप्रति,

- जेणे सवा लाख जिनमंदिरो बनाव्या... दक्षिण प्रदेशने साधुओना विहारने योग्य बनावीने लाखो लोको सुधी जैन धर्म पहोंचाड्यो.

- आ राजाना प्रतिबोधमां निमित्त बन्युं – आचार्य भगवंतनुं सामैयुं...

- जिनशासनमां देव-गुरुनी महत्ता वधारवा माटे उचित आडंबरनां जे विधान छे, ते सार्थक छे ! ए, आ घटना आपणने

जणावे छे.


→ आजे एवुं बने छे के कोइक अनुष्ठानमां अविवेक वगेरे कारणे कंइक अनुचित थाय, तो तेने highlight/enlarge

करीने अनुष्ठानने ज वखोडी देवामां आवे छे. अने ते य एटले सुधी के ‘कोइए क्यांय कोइ अनुष्ठान करवा/कराववा

ज न जोइए’ – एवो प्रचार जोरशोरथी करवामां आवे छे.

→ त्यारे ए समजवुं जरूरी छे के विशिष्ट ज्ञान-परिणति-विवेक न धरावता जीवो माटे, उचित अनुष्ठानो अने आडंबर

जिनशासन साथे जोडवाना सशक्त अने कदाच एकमात्र माध्यम छे...

→ तेने जो सर्वथा अटकावी देवामां आवशे, तो केटलाय जीवो जिनशासन पामवाथी वंचित रही जशे.

एटले, कोइ अनुष्ठानमां कंइक अनुचित थाय, तो ते अनुचितने दूर करवानो, तेवुं फरी न थाय तेनी सावधगीरी

राखवानो उपदेश करी शकाय... अनुष्ठानने सर्वथा वखोडी न शकाय... अनुष्ठाननो विरोध तो शासननी सेवा नहीं,

शासनना लोपनी प्रवृत्ति बने...




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