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धर्ममां धनवानोनुं महत्त्व...

  • Jun 9
  • 2 min read
An illustration explaining the different perspectives of Naya in Jainism as taught by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.


भ्रमणा : आपणा धर्ममां धनवानोने सर्वत्र आगळ कराय छे ते योग्य नथी. धर्ममां धननुं महत्त्व न होवुं जोइए.


वास्तविकता : लीला चश्मा पहेर्या होय, तेने बधुं लीलुं देखाय. सम्यग् दर्शन माटे दृष्टि सम्यक् जोइए.


आपणा धर्ममां धनवानोनुं (तमने देखातुं) जेटलुं महत्त्व छे, तेना करतां आराधकोनुं महत्त्व घणुं घणुं वधारे छे, कराय छे.

  1. सर्वत्र विरतिधर महात्माओ, जे अकिंचन छे, तेमनुं स्थान सौथी ऊंचुं होय छे... तेमनुं नाम सर्वत्र पहेलुं लखाय छे.. पाछळथी आवेला महात्माओने पण सर्वत्र आगळ आववा मळे छे... बधा ज तेमने वंदन करे छे...

  2. श्रावकोमां पण, पौषधधारी–सामायिकधारी श्रावकोनुं स्थान सौथी आगळ होय छे... अबजोपति पण तेमनी पाछळ बेसे छे... व्याख्यानमां महात्माने वंदन पण तेओ करावे छे... सामायिक लेवानी होय, तो करेमि भंते तेमनी पासे उच्चरावाय छे...

  3. दीक्षा प्रसंगमां दीक्षार्थीनुं महत्त्व धनवानो करतां घणुं वधारे होय छे - ए सुप्रतीत छे.

  4. तपश्चर्यानां पारणां होय, तो तपस्वीओनुं महत्त्व धनवानो करतां वधु होय छे... तेमनुं बहुमान करवा धनवानो चडावा बोलीने लाभ ले छे..

आवां बीजां पण अढळक दृष्टांतो आपी शकाशे. एटले सर्वत्र धनवानोने आगळ कराय छे – ए वात ज साची नथी. बीजी वात ए छे के धनवानोने आगळ नथी करातां, दान आपनाराओने आगळ कराय छे.

→ ए धननुं महत्त्व नथी, दानधर्मनुं बहुमान छे.

→ जेम तपधर्मना कारणे तपस्वीनुं बहुमान थाय...

→ जेम शीलधर्मना कारणे विरतिधरनुं बहुमान थाय...

→ तेम दानधर्मना कारणे दानवीरनुं बहुमान थाय... तो तेमां खोटुं शुं छे ?

याद रहे, अबजो रूपिया होवा छतां जे संघमां कोइ लाभ न लेतो होय, तेने कदी आगळ करातो नथी... बीजानी अपेक्षाए संपत्ति ओछी होवा छतां जे सारो लाभ लेतो होय, तेने ज आगळ कराय छे...ए स्पष्टपणे दानधर्मनुं ज बहुमान छे, धननुं नहीं.

  • जेम संघ-शासन चलाववा आराधना-आराधको जरूरी छे, तेम आराधनानां स्थानो-सामग्री पण जरूरी छे ज. तेना विना आराधना शी रीते थशे ? ए आराधनानां स्थानो-सामग्री, ऊभा करवा-टकाववा माटे संपत्ति अनिवार्य छे. तेथी ज शास्त्रकारोए धर्मद्रव्यनी व्यवस्थाओ बतावी छे. शासन चलाववा जे अनिवार्य छे, तेवां स्थानोने टकाववामां जेमनो सिंहफाळो होय, तेवा दानवीरोनी उपेक्षा शी रीते करी शकाय ? तेमने उचित स्थान अने उचित महत्त्व आपवुं - ए परंपराए शासननी अविच्छिन्न परंपरा चलाववा माटे आवश्यक छे.

  • शासन टकाववा माटे, सत्ताधारीओनो सहकार पण अनिवार्य छे. तेथी क्यारेक अनिच्छाए पण तेमने महत्त्व आपवुं पडे छे. अने सत्ताधारीओ सुधीनी पहोंच, धनवानोनी ज होय छे. (कारणके सत्ता टकाववा धननी जरूर पडती होय छे.) एटले, जे धनवानो, सत्ताधारीओ साथेना संबंधने कारणे शासन टकाववामां सहायक बने छे; तेमने उचित स्थान अने महत्त्व आपवुं - ते पण शासननी अविच्छिन्न परंपरा चलाववा जरूरी छे.

  • जेओ धनवानो-दानवीरोने उचित स्थान नकारे छे, तेओ हकीकतमां परंपराए शासनना विच्छेदमां निमित्त बने छे. ए शासन-भक्ति नथी, शासन-द्रोह बनी शके छे. एटले, अविवेकीओनी वातमां आवीने दानवीरो-धनवानोनी उपेक्षा भूलेचूके करवा जेवी नथी.

  • प्रभुना समवसरणमां पण राजा वगेरेनुं स्थान नियत होय छे. तेमने उचित स्थान अपाय ज छे.




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