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शास्त्रवचनोमां विरोध...

  • 2 days ago
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An illustration explaining the different perspectives of Naya in Jainism as taught by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.


  • शास्त्रवचनोना तात्पर्य सुधी पहोंचवा माटे, पदार्थ-वाक्यार्थादि क्रमे ऊहापोह जरूरी छे.

    अन्य शास्त्रवचनो साथे विरोधनुं उद्भावन – ए ज वाक्यार्थ छे.

    जे व्यक्ति, तेवो ऊहापोह करीने विरोधनुं उद्भावन ज न करे, एक शास्त्रवचनने सर्वथा-सर्वदा-सर्वत्र प्रमाण मानी ले, ते ‘पदार्थ’मां ज अटकी जाय छे, तेने श्रुतज्ञान ज थाय छे, चिंता-भावना ज्ञान थतां नथी – एम उपदेश-रहस्यादि ग्रंथोमां कह्युं छे.

  • विरोधनुं उद्‌भावन कर्या पछी, महावाक्यार्थ सुधी शी रीते पहोंचाय ? ते विशे यत्किंचित् विचारणा करीए.


चरणकरणानुयोग

  1. समन्वय

    ते बे शास्त्रवचनो वच्चे परस्पर विरोध छे ज नहीं – तेवुं स्थापित करवुं.

    ए बे रीते थइ शके 🡺

    A. कोइ एक शास्त्रवचन अथवा कोइ एक शब्दनो लक्षणार्थ करवो.

    जेम के ‘हिंसा न करवी’ अने ‘पुष्पादिथी जिनपूजा करवी’ आ बे शास्त्रवचनोना देखीता विरोधनो समन्वय, ‘हिंसा न करवी’ वाक्यमांना ‘हिंसा’ शब्दनो अर्थ अनुबंधहिंसा करीने कराय छे. पुष्पादिथी जिनपूजा करवामां अनुबंधहिंसा न होवाथी, बे वचनो वच्चे विरोध रहेतो ज नथी.

    B. बे वचन जुदा जुदा संयोगोमां – जुदी जुदी व्यक्तिने लागु पडे छे, तेवुं सिद्ध करवुं.

    जेम के सामाचारी प्रकरणमां शास्त्रवचन छे के चारित्राचारना पालन पूर्वक ज ज्ञाननुं उपार्जन कराय. बीजी बाजु दर्शन-प्रभावक शास्त्रो भणवा माटे जरूर पडे तो चारित्राचारमां छूट लेवानी वात पण छेदग्रंथोमां छे.

    आनो समन्वय आ रीते करी शकाय – सामाचारी प्रकरणनुं विधान, विशिष्ट पुण्य-प्रतिभा वगेरे शक्तिथी रहित एवा साधुने लागु पडे छे, जेणे स्व-कल्याण ज करवानुं छे. (ते भणीने पर-कल्याण करी शके, तेवुं सामर्थ्य ज नथी. तो भणवा माटे आचार शा माटे छोडवा ?)

    छेदग्रंथोनुं विधान, विशिष्ट शक्तिसंपन्न साधुने लागु पडे छे. ते भणवा द्वारा स्व-परनी दर्शन विशुद्धि, शासन-प्रभावना वगेरे अनेक परोपकारो करीने घणो लाभ मेळवी शके छे. (अने गीतार्थ-परिणत होवाथी जयणापूर्वक अपवाद सेवे, त्यारे परिणतिनी रक्षा करी शके छे.)

  2. विरोधनो स्वीकार

    ते बे शास्त्रवचनोना अर्थमां विरोध छे ज – ते स्वीकारी लेवुं. छतां ते बंने वचनो जिनशासनमां स्वीकार्य छे – तेवुं सिद्ध करवुं. ते पण बे रीते थइ शके 🡺

    A.  भिन्न सामाचारी रूपे स्वीकारवुं.

    जुदा जुदा क्षेत्रमां विचरनारा गच्छोमां, जुदा जुदा स्थळे थयेला गीतार्थोए तत्कालीन परिस्थितिना आधारे जे निर्णयो कर्या होय, जे आचारो प्रवर्ताव्या होय, तेमां भेद संभवे छे.

    जेम के बावीस तीर्थंकरना साधुओ अने पहेला-छेल्ला तीर्थंकरना साधुओ वच्चे आचार-भेद छे ज.

    टमेटां वगेरे द्रव्योनी भक्ष्यता-अभक्ष्यता आदि अनेक आचारोमां भेद देखाय छे. तेने भिन्न सामाचारी रूपे स्वीकारवा जरूरी छे.

    B.  मतांतर रूपे स्वीकारवुं.

    मोढे चालतां सूत्रोमां विस्मरणादि कारणे थयेला पाठ-परावर्तन, लहियाओनी भूलना कारणे घूसी गयेली अशुद्धिओ.. वगेरे कारणे पाठोमां भेद पडे छे. पोत-पोतानी गुरुपरंपराथी थतां अर्थघटनोमां पण भेद पडे छे.

    • मतांतर अने भिन्न-सामाचारी वच्चे सूक्ष्म भेद छे.

      Ø  तत्कालीन-तत्क्षेत्रीय निर्णयोथी भिन्न सामाचारी ऊभी थाय छे.

      Ø  पाठभेद-अर्थघटनभेदथी मतांतर ऊभो थाय छे.

      क्यारेक आ सूक्ष्म भेदने नजरअंदाज करीने, मतांतरने पण भिन्न सामाचारीमां खपावी देवाय छे.

    • भिन्न सामाचारी होय, त्यां बंने तुल्यरूपे स्वीकार्य होय छे.

      मतांतर होय, त्यां हकीकतमां एक पाठ अशुद्ध होवाथी अथवा एक अर्थघटन भूलभरेलुं होवाथी कोई एक मत स्वीकार्य नथी होतो. पण तेनो निर्णय अतिशय ज्ञानी विना मुश्केल होय छे. क्यारेक कोइ ज्ञानी सत्यनो निर्णय करे, तो पण विशिष्ट पुण्य विना ते बधाने स्वीकार्य नथी बनतो, सहुने पोतपोताना मतनो आग्रह आवी जाय छे.

      क्षये पूर्वा ना अर्थघटनभेदथी ऊभो थयेलो तिथिभेद, ए आनुं दृष्टांत छे.

      प्रश्न : बंने अर्थघटन साचां होय, तेवुं शक्य न बने ?

      बे पदार्थो परस्पर विरोधी न होय, तो ज ते शक्य बने. एटले त्यां विरोध होतो ज नथी.

    • सामाचारी ए स्याद्वादनुं भूषण छे, गीतार्थतानी नीपज छे.

      मतांतरने स्याद्वादनुं भूषण न कही शकाय, ते अज्ञाननी नीपज छे. मोटे भागे संघर्ष-संक्लेशनुं कारण बने छे.

      छतां, अतिशय ज्ञानीनी गेरहाजरीमां मतांतरो अनिवार्य छे – ए स्वीकारवुं रह्युं.

  3. अशुद्धिनो निर्णय

    बेमांथी एक ज वचन/अभिप्राय/पाठ/अर्थघटन साचुं छे, बीजुं खोटुं ज छे, जिनशासनने अमान्य छे – तेवो निर्णय.

    आ निर्णय करवानो अधिकार शास्त्राभ्यास-अनुभव आदिथी परिपक्व ज्ञान धरावता गीतार्थने ज होय छे. पण ते होय छे, तेवुं मानवुं तो पडे ज, कारणके 🡺

    ‘१० पूर्वधर पछीना ग्रंथकारोए रचेलुं श्रुत निर्विकल्प प्रमाण नथी’ एम शास्त्रमां ज कह्युं छे.

    • कया आधारो पर अशुद्धिनो निर्णय थाय ?

      A. लगभग सर्वमान्य, सर्व शास्त्रोमां व्यक्त थयेला अभिप्रायथी जुदो अभिप्राय कोइक एकाद स्थळे जोवा मळ्यो होय.

      B. जे ग्रंथना रचनाकार अज्ञात होय, जे ग्रंथकारनी बहुश्रुतता के संविग्नता पर प्रश्नार्थ होय.

      C. स्वेष्ट मान्यताना समर्थन माटे (उत्सूत्रवादी) परपक्षीओए पाठमां भेळसेळ करी होवानुं जणातुं होय.

      जेम के चोमासीनुं ज पूनममांथी चौदशमां परावर्तन थयुं होवा छतां, पक्खीनुं परावर्तन थयुं होवानुं विधान. (जे पाठ पूनमिया गच्छवाळाए प्रक्षिप्त कर्यो छे.)

      D. चरितानुवादमां क्यांय न जोवा मळता, वर्तमान व्यवहारमां पण अप्रसिद्ध एवा कोइ कार्यनुं क्यांक ज विधान होय.

      E. जे कार्य अनुबंधमां राग-द्वेष वधारनारुं ज छे, घटाडनारुं नथी ज, एनो निर्णय सुदृढ रीते थइ जतो होय – तेवा कार्यनुं विधान होय.

      F. शासन-स्थापना पछी सेंकडो वर्ष सुधीना ग्रंथोमां न देखाता कोइ कार्यनुं विधान पाछळना केटलाक वर्षोना ग्रंथोमां ज मळतुं होय, अने तेथी एवो निर्णय थतो होय के चैत्यवादी वगेरे शिथिलाचारीओए पोताना शिथिलाचरणना बचाव माटे आ विधानो उमेर्या छे, अने पछी तेनुं वगर विचारे अनुसरण थयुं छे.

      जेम के गुरुनी अंगपूजानां क्वचित् मळतां विधानो.

      आवां अन्य पण कारणो, अशुद्धिनो निर्णय करवा माटेना संभवे छे.

    • आवी अशुद्धिनो निर्णय करीने जे संघ समक्ष रजू करे, ते उत्सूत्रना निर्मूलन द्वारा संघनी महान् सेवा करे छे, तीर्थरक्षानुं सर्वोत्कृष्ट कार्य करे छे.


द्रव्यानुयोग

  1. विवक्षा मानवी

    हकीकतमां पदार्थ एक ज छे, बीजा ग्रंथकारनी विवक्षा जुदी होवाथी तेनो उल्लेख नथी, तेम मानवुं.

    जेम के विभंगज्ञान पूर्वे निराकारोपयोग रूप अवधिदर्शन होय तो खरुं ज; पण केटलाक ग्रंथोमां तेनी विवक्षा नथी, अर्थात् ग्रंथकारे कह्युं नथी. (विवक्षा = कहेवानी इच्छा.)

    ज्यारे एक पदार्थ सिद्धांत रूपे सुनिश्चित होय, त्यारे तेनाथी भिन्न एवी कोई वात जोवा मळे, तेने विवक्षा रूपे मानी शकाय.

  2. मतांतर मानवो

    हकीकतमां तो एक ज पदार्थ सत्य होय, पण कयो ? तेनो निर्णय करी न शकाय, त्यारे ज्यां सुधी तेनो निर्णय न ज थाय, त्यां सुधी बंने मत ऊभा राखवा पडे.

    जेम के केवली भगवंतने क्रमशः-युगपद् उपयोग, अनेक विषयोमां कार्मग्रंथिक/सैद्धांतिक मतांतरो.

    ज्यारे बंने अभिप्रायने कहेनारा प्रमाणभूत बहुश्रुत गीतार्थ होय, विवक्षा- विशेष मानीने समन्वय शक्य न होय, त्यारे मतांतर ज मानवो पडे.

  3. अशुद्धि मानवी

    एक शास्त्रवचन/अर्थघटन साचुं मानीने, बीजाने खोटुं मानवुं.

    आनो निर्णय कोण ? केवी रीते ? करी शके, ते विषय, चरणकरणानुयोगमां विस्तृत जणाव्यो छे; ते यथासंभव अहीं समजी लेवो.


धर्मकथानुयोग

  • धन्ना-शालिभद्र मोक्षमां गया – तेवुं वचन पण छे, सर्वार्थसिद्धमां गया – तेवुं पण वचन छे.

    आ विषयमां निर्णय करवा माटे लगभग कोइ ज परिबळ मळतुं न होवाथी, तेने मतांतर ज मानवो पडे छे.

    आवी घटनाओ धर्मकथानुयोगमां अनल्प छे.

  • ए ध्यानमां राखवुं के धर्मकथानुयोगमां संविग्न-गीतार्थे करेली देशनानुं वर्णन होय, तो ते देशनानी अंतर्गत आवतां वचनो चरणकरणानुयोगना वचनरूप ज गणाय, धर्मकथानुयोग मात्र नहीं.


द्रव्यानुयोग V/S चरणकरणानुयोग

  • द्रव्यानुयोगमां मोहनीय कर्मना क्षयोपशमादिथी गुणोनी प्राप्ति बतावी छे, अने मोहनीय कर्मना क्षयोपशमनां कारणो बताव्या छे.

    चरणकरणानुयोगमां एवुं कार्य करवानुं विधान होय, के जेनाथी मोहनीय कर्मनो क्षयोपशम थतो ज न होय (यावद् बंध पण थतो होय), (तेथी गुणप्राप्ति-दोषनाश पण न थतो होय) तो शुं करवुं ?

    तो स्वाभाविक छे के द्रव्यानुयोगनुं वचन प्रमाणभूत छे, कारणके ते सिद्धांत छे. (समग्र द्रव्यानुयोग, सिद्धांतरूप ज छे.) तेनाथी विरुद्ध जता चरणकरणानुयोगना वचननी लक्षणा करीने बदलवो पडे, अथवा तो तेने अशुद्धि मानवी पडे.

    राग-द्वेषनो नाश नहीं करनार एवुं ध्यान बतावनार धर्म, कष परीक्षामां अशुद्ध निर्णीत थाय छे – तेवुं शास्त्रवचन ए ज जणावे छे ने ?

    (अलबत्त, क्वचित् एवुं पण संभवे के निर्विकल्प प्रमाण एवा केवलीना चरणकरणानुयोगना वचनानुसारे, द्रव्यानुयोगना पदार्थनो निर्णय करवामां आवे.)


द्रव्यानुयोग के चरणकरणानुयोग V/S धर्मकथानुयोग

  • आना ऊंडाणमां जवा माटे, धर्मकथानुयोग (एटले के थइ गयेल घटनानां वर्णनो)नां वचनोना बे विभाग पाडवा पडे 🡺

    A. ‘कोइके कर्युं’.. एवुं विधान.

    B. ‘कांइक थयुं’.. एवुं विधान.

  • आमां बीजा प्रकारनुं विधान सामान्यथी तो निर्विकल्पे प्रमाण बने. जे थयुं छे, ते थयुं छे. ते न थइ शके, तेवुं केम मनाय ?

    तदनुसारे द्रव्यानुयोगना सिद्धांतो निर्णीत थाय. जो द्रव्यानुयोगनां वचनो तेनाथी विरुद्ध जता होय, तो ते विधानो बहुलताए छे, आपवादिक रूपे अन्यथा बनी शके.. विगेरे रूपे समन्वय थाय.

    जेम के द्रव्यानुयोगनां वचनो, चोथा गुणस्थानके मनुष्यगतिमां स्त्रीवेदे जन्मनो निषेध करे छे. पण ब्राह्मी-सुंदरी वगेरेनो थयो छे – तेवुं धर्मकथानुयोगनुं वचन छे. तो अपवादे तेवुं थइ शके – तेवुं मानवुं पडे. द्रव्यानुयोगनुं वचन बहुलताए मानवुं पडे, नियमरूप नहीं.

  • बीजा प्रकारनां विधान साथे चरणकरणानुयोगना वचननो विरोध आवे, तो तेमां लक्षणा विगेरे करीने पण धर्मकथानुयोगमां जेनुं वर्णन छे, ते घटना सिद्ध करवी पडे, तेने अप्रमाण न मनाय.

    जेम के देवलोकनी इच्छाथी अवंति सुकुमाले अने खावानी इच्छाथी संप्रतिना जीवे चारित्र लीधुं, ते तेमना आत्माने हितकर बन्युं ज छे. तो इहलौकिक-पारलौकिक आशंसाथी करेलो धर्म पण आत्महितकर बनी शके – एवुं मानवुं ज पडे. कोइ शास्त्रवचन तेने विरोधी मळे, तो तेमां जे इह-परलौकिक अपेक्षा जणावी, ते अबाध्य कक्षानी होय, तेवो लक्षणार्थ करवो पडे, करायो छे.

    हा, कोइ कथाग्रंथनां घणां विधानो आवां मळवाथी ते ग्रंथना रचयितानी बहुश्रुतता के संविग्नता पर ज प्रश्नार्थ होय, ग्रंथकार ज अनिर्णीत होय; तो पछी ते वचनने अप्रमाण मानवामां आवे – ते जुदी वात छे.

  • हवे पहेला प्रकारनुं विधान (‘कोइके कर्युं’) विचारीए.

    तेनो पण जो द्रव्यानुयोगना वचन साथे विरोध थाय, तो द्रव्यानुयोगनुं वचन बहुलताए मानीने, धर्मकथानुयोगमां बतावेल घटना आपवादिक मानीने पण समन्वय करवो पडे. जे कर्युं छे, ते करी शकातुं होय, तो ज थाय ने ?

    जेम के, धर्मकथानुयोगमां आवे छे के ‘चमरेन्द्र सौधर्म देवलोक सुधी गया.’ हवे द्रव्यानुयोगनां वचन मुजब तेमनुं सामर्थ्य मेरुशिखर सुधी जवानुं ज छे. छतां जो धर्मकथानुयोगमां वचन छे के ‘गया’, तो पछी अपवादे तेवुं सामर्थ्य मानवुं पडे.

  • ‘कोइके कर्युं’ ए घटनानो चरणकरणानुयोगना वचन साथे विरोध आवे, (अर्थात् चरणकरणानुयोगमां तेनो निषेध होय) तो कोणे कर्युं ? ते विचारवानुं रहे.

    A.  अज्ञानी के असंविग्नए जे आचर्युं होय, ते तो प्रमाणभूत बनतुं ज नथी, एटले त्यां चरणकरणानुयोग ज प्रमाण गणाय, धर्मकथानुयोग नहीं.

    B.  ज्ञानीनां आचरण अनेक प्रकारना होय 🡺

    a.   औत्सर्गिक

    b.   आपवादिक

    c.   प्रामादिक.

    आमां प्रामादिक सिवायना आचरण प्रमाणभूत बने छे. शास्त्रमां संविग्नोनी आचरणा प्रमाणभूत गणाइ छे ज.

    Ø  औत्सर्गिक आचरण, सर्व क्षेत्र-काळ-संयोगमां प्रमाण बने.

    Ø  आपवादिक आचरण, ते अपवादनां कारणो विद्यमान होय, तेवा संयोगोमां प्रमाण बने.

    वीतरागने प्रामादिक आचरण संभवतुं नथी.

    अन्योना आचरणमां प्रामादिक कयुं ? अने औत्सर्गिक-आपवादिक कयुं? तेनो निर्णय करवो जरूरी बने.

  • प्रामादिक होवानो निर्णय करवा माटे आटलां कारणो होइ शके 🡺

    A.  अन्य ज्ञानीए, ते आचरण प्रमाद रूप होवानो स्पष्ट उल्लेख कर्यो होय.

    जेम के 🡺

    Ø  प्रभु वीरे कुलपतिने भेटवा माटे हाथ पहोळा कर्या..

    Ø  भद्रबाहु स्वामीए साधुओने पूर्व भणाववानो निषेध कर्यो..

    Ø  सिद्धसेन दिवाकर सूरि द्वारा पालखीनो उपयोग..

    B.  जेनां अशुभ फळ बताववा द्वारा ते प्रमाद रूप होवानो उल्लेख थयो होय.

    जेम के 🡺

    Ø  संभूति मुनिए करेलुं नियाणुं..

    Ø  कुवलयप्रभसूरि (सावद्याचार्य)नी घटना..

    अन्य ज्ञानीओए तेमां अस्वरस प्रगट कर्यो होय, अवसर प्राप्त थवा छतां तेनुं अनुसरण/अनुमोदना टाळी होय.

  • ज्ञानीनुं आचरण प्रामादिक नथी ज, एवो निर्णय करवा माटे आटला परिबळ होइ शके 🡺

    A.  जेने अन्य संविग्नो अनुसर्या होय.

    जेम के कालिकाचार्यनुं संवत्सरी-परावर्तन.

    B.  जेनी अन्य ज्ञानीए अनुमोदना करी होय. जेम के 🡺

    Ø  वज्रस्वामीनुं विमान-गमन (तेवा विशिष्ट संयोगोमां ज प्रमाणभूत बननारुं ते आपवादिक कृत्य हतुं)..

    Ø  कालिकाचार्यनुं (गर्दभिल्लना पराजय माटे) विदेशगमन..

    C.  अवसर आववा छतां, तत्कालीन के तरतना पश्चात्कालीन ज्ञानीओए तेनो विरोध न कर्यो होय.

    (घणां काळ पछी विरोध न थवानुं कारण, चिररूढ थइ गयेल मान्यतानो विरोध न करवानुं शास्त्रवचन, संघभेदनो भय वगेरे होवानो संभवित छे. एटले घणा काळ पछीना अविरोधथी कोइ आचरणनी अप्रामादिकता सिद्ध न पण थाय.)

  • क्यारेक एवुं पण बने छे के राजाभियोग, गणाभियोग, गुर्वभियोग वगेरे कारणे ज्ञानीए अस्वरसपूर्वक कंइक आचर्युं होय. ते प्रमाद तो नथी ज. आम तो तेने आपवादिक मानी शकाय, कारणके तेवा अभियोग, अपवादाचरण माटेना सबळ कारण छे ज.

    पण तेवा आपवादिक आचरण बीजाने अनुसरणीय बनवा रूप प्रमाणभूत बनता नथी, सिवाय के तेमना पर तेवो ज अभियोग थाय.

  • भक्तवर्गादिना आग्रहने कारणे दाक्षिण्यथी कंइक कराय, तो वास्तविक रीते ते प्रमाद ज छे, एटले ते प्रमाणभूत बनतुं नथी.

  • संघभेदने रोकवा माटे ज्ञानीए अस्वरसथी कंइक आचर्युं होय, तो ते प्रमाद नथी, अपवाद छे. अने ज्यां सुधी संघभेद थतो रोकवा माटे ते जरूरी होय, त्यां सुधी ते अपवादनुं कारण विद्यमान होवाथी प्रमाणभूत आचरणा ज छे.

  • प्रमाणभूत बनती आचरणामां कइ औत्सर्गिक ? कइ आपवादिक ? ते एक विशेष विचारणानो विषय बने. अहीं मात्र प्रमाणभूततानो निर्णय ज अपेक्षित होवाथी, ते विशेष विचारणा करी नथी. छतां सामान्य निर्देश आ मुजब छे.

    A.  कारणे करायेली आचरणा पण व्यापक स्तरे अनुसराय, त्यारे औत्सर्गिक जेवी बने छे.

    जेम के भादरवा सुद चोथनी संवत्सरी, प्रतिक्रमणना विधिमां वधारा, गोचरी-पद्धति वगेरे.

    आमां पण बे प्रकार पडशे 🡺

    a. फरजीयात बनेल आचरणा. जेम के देवसि प्रतिक्रमणना अंते लघु शांतिनुं पठन वगेरे. ए न करवामां प्रायश्चित्त छे.

    b. मरजीयात आचरणा. जेम के झोळीमां बे थी वधु पातरा राखवा. ते न राखनारने प्रायश्चित्त नथी. छतां राखनारने पण प्रायश्चित्त अपातुं न होवाथी, ते औत्सर्गिक-तुल्य छे.

    B.  जेनो शास्त्रमां उल्लेख ज नथी, तेनो निर्णय करवानो अवसर आववाथी गीतार्थो जे करे, ते औत्सर्गिक बने छे.

    जेम के कृत्रिम उत्पन्न करायेल वीजळीना उपयोगनुं वर्जन..

    ते फरजीयात बने छे, तेना भंगमां प्रायश्चित्त होय छे.

    C.  क्षेत्र-काळ-संयोग विशेषमां ज जे आचराय, ते आपवादिक बने छे.

    तेमां पण बे भेद पडे छे 🡺

    a.   जे फरजीयात होय छे, न करवामां प्रायश्चित्त होय छे.

    जेम के संविग्न साधुओ द्वारा पीळां वस्त्रो पहेरवा, शत्रुंजयनी यात्रा पर प्रतिबंध वगेरे.

    b. जे मरजीयात होय छे. सत्त्वशाळी तेनो आश्रय न करे, तो प्रायश्चित्त नथी होतुं, ऊल्टुं अनुमोदनीय होय छे. छतां, तेना आचरणमां पण प्रायश्चित्त नथी होतुं. (अजयणानुं प्रायश्चित्त होय.)

  • आ बधी विचारणा, पूर्वाचार्योए जे कर्युं होय, तेना विशे थइ.

    श्रावकोए जे कर्युं होय, ते प्रमाण न ज बने, तेवुं नथी.

    शास्त्रोमां सूर्याभ देव अने द्रौपदीना दृष्टांतथी जिनपूजा वगेरे कार्यो सिद्ध करेला छे ज. (अलबत्त, ते चरणकरणानुयोगना विरोधी नथी, कारणके चरणकरणानुयोगना ग्रंथोमां तेनां विधान छे ज. पण टीका वगेरे विना, मात्र मूळ आगमोनो ज विचार करवानो होय, तो तेमां अगियार अंगमां ‘श्रावके जिनपूजा करवी जोइए’ एवां विधानो बहु ज अल्प मळे छे. (कारणके मूळ आगमोमां श्रावको माटेनां विधानो ज अल्प छे.) एटले मूळ आगमनां वचनोथी ज जिनपूजानी सिद्धि करवी होय, तो श्रावकोए करी होवानी घटनाना वर्णननो आधार लेवाय छे.)

    एटले, श्रावकोनी आचरणाथी कशुं सिद्ध न थाय, तेवुं नथी ज.

    तेनो अर्थ एवो पण नथी के श्रावकोए जे कर्युं होय, ते बधुं ज प्रमाणभूत सिद्ध थाय.

    Ø  आनंद-कामदेव वगेरे पासे करोडोनी संपत्ति हती – तेनुं वर्णन आवे छे. तेथी कंइ ‘श्रावके करोडोनो परिग्रह करवो जोइए’ तेवुं सिद्ध न ज थाय.

    Ø  शालिभद्रने ३२ पत्नी हती – तेनुं वर्णन छे. तेनाथी कंइ ‘श्रावके घणी पत्नी करवी जोइए’ तेवुं सिद्ध न ज थाय.

    (केटलाक लोको, आनंद-कामदेवना परिग्रहमां पशुओनुं वर्णन होवाथी ‘श्रावकोए पशुपालन करवुं जोइए’ एवुं सिद्ध करवा प्रयत्न करे छे. ते सर्वथा अनुचित छे. कारणके ते रीते तो बहुपत्नीत्व पण उपादेय सिद्ध थशे. अने श्राद्धविधि वगेरे ग्रंथोमां, श्रावकने पशुपालननो निषेध करेलो छे.)

    तो प्रश्न थाय के श्रावके शुं कर्युं होय, ते प्रमाणभूत सिद्ध थाय ? शुं कर्युं होय, ते प्रमाणभूत सिद्ध न थाय ?

    तेनो उत्तर आ मुजब 🡺

    A. श्रावके करेला सांसारिक कार्यो तो प्रमाणभूत सिद्ध न ज थाय. संसार तो त्यागवानो ज छे.

    हा, जे संसारमां रह्या ज छे, तेने केटलाक कार्यो अनिवार्यपणे करवा पडे. जेम के घर चलाववा जेटली संपत्ति कमावी-राखवी पडे.. संतानो होय, तो तेमने ठेकाणे पाडवा पडे.. वगेरे..

    पण तेमां शक्य तेटली जयणा (अल्पता) ज उपादेय छे. तेथी ते कार्य अनिवार्य फरज रूपे सिद्ध करवा कोइ श्रावके कर्यानुं उदाहरण लेवाय, ते वात जुदी. पण उत्साहथी-उल्लासथी-सामे चडीने करवा योग्य रूपे तो सिद्ध न ज थाय.

    B.  श्रावके सांसारिक कार्योमां जे उचित जयणानुं पालन कर्युं होय, ते प्रमाणभूत सिद्ध थइ शके, जो श्रावक विवेकवंत होय, तो.

    C. श्रावके धर्म मानीने जे कार्य कर्युं होय, ते पण प्रमाणभूत सिद्ध थइ शके, जो श्रावक विवेकवंत होय, तो.

    D. संविग्न-गीतार्थ एवा शास्त्रकारे श्रावकना जे कार्यने वखाण्युं होय, तेनां शुभ फळ बताव्या होय.. ते तो प्रमाणभूत सिद्ध थाय ज, तेमां कोइ प्रश्न ज नथी.





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