समिति–गुप्ति...
- Jul 6
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समितिगुप्तीनां महाव्रतरूपत्वेन.. (उपदेश पद – ६०२ टीका)
प्रश्न : महाव्रतो मूळगुण रूप छे, समिति-गुप्ति तो उत्तरगुणरूप छे. तो समिति-गुप्तिने महाव्रतरूप शी रीते
कहेवाय ?
उत्तर : आनुं समाधान आवुं संभवे छे 🡺
महाव्रतो बधा अभाव रूप छे – त्याग रूप छे..
हिंसानो त्याग, मृषानो त्याग.. यावत् परिग्रहनो त्याग.
त्यागनी परिणति होई शके. अने ए परिणति ज महाव्रत छे – मन-वचन-कायाथी हिंसादि करवा-कराववा-
अनुमोदवा
नहीं. त्यागनी प्रवृत्ति शुं होय ?
पासे होय, ते परिग्रह छोडी देवा रूप प्रवृत्ति एकादवार थाय, यावज्जीव शुं थाय ?
कशुं नहीं.
पण, जेनो त्याग कर्यो छे, ते अनाभोगादिथी पण न थइ जाय, तेना माटे प्रवृत्ति थइ शके. ते बधी उत्तरगुणरूप ज
छे,
जेम के चतुर्थव्रतनी नव वाड.
एटले, परिणतिरूप महाव्रतोने क्रियामां उतारवा, उत्तरगुणोनुं ज आचरण करवानुं होय छे.
एटले ज उत्तरगुणोना आचरणमां वारंवार शिथिलता, ए मूळगुणनी हानिनुं कारण बतावेलुं छे. (उपदेशमाळा)
एटले ज अहीं समिति-गुप्तिने महाव्रतरूप कही छे.
वस्तुतः महाव्रत ए परिणति छे – निश्चय छे.
समिति-गुप्ति ए आचार छे – व्यवहार छे.
व्यवहार-निश्चय परस्पर पर अवलंबित छे.. बंने एकबीजाना कारण पण छे, कार्य पण छे.. एकबीजाने पुष्ट करनारा छे.. एटले कथंचिद् एकरूप छे.
एटले, समिति-गुप्तिनी उपेक्षा, ए महाव्रत-परिणतिना अभावनी द्योतक छे.
समिति-गुप्तिनी दृढता, महाव्रत-परिणति होवानी दृढ संभावनानी द्योतक छे.
समिओ नियमा गुत्तो...
गुप्ति = अशुभ प्रवृत्तिथी निवृत्ति.
एमां बे संभावना छे.
शुभ प्रवृत्ति होय.
शुभ प्रवृत्ति न होय.
बीजी संभावनाने आश्रयीने, शुभाशुभ उभय प्रवृत्तिथी निवृत्तिने गुप्ति कहेवाइ छे; पण त्यां ए समजवानुं छे के ते एक पेटाभेद छे. तेमां गुप्ति तो अशुभथी निवृत्ति रूप अंश ज छे. शुभथी निवृत्ति रूप अंश गुप्ति नथी; कारणके शुभमां प्रवृत्ति होय त्यारे पण गुप्ति तो होय ज छे.
(जेम के मनुष्यने जीव कहेवाय, ते आत्मांशने लइने ज छे, मनुष्यांशने लइने नहीं; कारणके जीव तो मनुष्य न होय, तेवा देवादिने पण कहेवाय ज छे.)
आवा सीधासादा तात्पर्यने एकांत निश्चयवादी क्रियाविरोधीओ पकडी शकता नथी, अने एटले, बीजा प्रकारनी गुप्तिना शास्त्रपाठो बतावीने शुभ क्रियाना त्यागनो उपदेश करे छे.
पहेली संभावनामां शुभ प्रवृत्ति पण होय छे, अर्थात् समिति पण होय छे.
समिति = शुभमां प्रवृत्ति.
शुभमां प्रवृत्ति होय, त्यारे अशुभथी निवृत्ति होय ज, कारणके शुभाशुभ बे प्रवृत्ति साथे न थाय.
एटले ज कह्युं के समिओ नियमा गुत्तो.
गुत्तो समिअत्तणंमि भइयव्वो – आ विधान बीजा प्रकारनी गुप्ति वखते संभवे छे. एमां पण मुख्यतया वचन-कायाने आश्रयीने ज ए संभवे छे, कारणके मन तो प्रवृत्ति विनानुं कदी होतुं नथी.
एटले, वचन-कायानी शुभ प्रवृत्ति न होय, त्यारे गुप्त छे, समित नथी – एवो तात्पर्यार्थ समजवानो छे.
(पांचे समिति, वचन-कायानी प्रवृत्ति रूप ज छे. वचन-काया विना, मात्र मननी प्रवृत्तिथी कोइ समितिनुं पालन संभवित नथी.)
व्यवहारमां, वचन-कायाथी प्रवृत्त माणसने ज प्रवृत्त कहेवाय छे. एने आश्रयीने ज आ विधान छे.
ज्यां मननी पण शुभ प्रवृत्ति न होय, तेवी गुप्ति तो मात्र मनोनिरोध पछी १४मा गुणस्थाने ज संभवे छे; कारणके १३मा गुणस्थान सुधी द्रव्यमन तो छे ज, एने आश्रयी मनोयोग पण छे ज.
उत्सर्ग-अपवाद
प्रश्न : गुप्ति ए उत्सर्ग छे, समिति ए अपवाद छे – आवुं शास्त्रविधान मळे छे. एनुं अर्थघटन ए ज ने के शुभ प्रवृत्ति आपवादिक छे ? अर्थात् मुख्य मोक्षमार्ग शुभाशुभ उभयथी निवृत्ति रूप गुप्ति ज छे ?
उत्तर : अपवाद कोने कहेवाय ? कारणिको विधिः अपवादः – ए तेनी व्याख्या छे. कारण आवे, त्यारे करवानुं होय, ते अपवाद.
ए व्याख्या मुजब तो उत्सर्ग उपवास छे.
एकासणुं पण (कारणिक होवाथी) अपवाद छे. शास्त्रमां बतावेल छ कारणोमांनुं एक कारण होय, तो ज वापरवानुं छे. एटले शुं एम कहेवाय के मुख्य मोक्षमार्ग उपवास छे ? एकासणुं करनार केवली भगवंतो के जिनकल्पिको अपवादनो आशरो लइ रह्या छे ?
याद रहे, केवली भगवंतनुं चारित्र निरतिचार छे – यथाख्यात छे. जिनकल्प निरपवाद यतिधर्म छे.
तो तेओ द्वारा थता एकासणाने अपवाद शी रीते कहेवाय ?
जो न कहेवाय, तो समितिने पण अपवाद न कहेवाय, कारणके जिनकल्पिको बधी ज समितिनुं पालन करे ज छे. केवली भगवंतो पण स्वोचित समितिओनुं पालन करे छे.
वस्तुतः उत्सर्ग-अपवादनी व्याख्याओमां विवक्षाभेदे भेद छे.
सानुकूळ द्रव्य-क्षेत्रादिमां जे आचरवानुं होय, ते उत्सर्ग..
प्रतिकूळ द्रव्य-क्षेत्रादिमां जे आचरवानुं होय, ते अपवाद..
आवी व्याख्या उपदेश पद, उपदेश रहस्य वगेरेमां छे. एवो अपवाद जिनकल्पिको कदी आचरता नथी, प्रतिकूळ द्रव्य-क्षेत्रादिमां पण उत्सर्गने पकडी राखवानुं सत्त्व – मनोबळ अने सामर्थ्य तेओ धरावे छे.
उत्सर्ग-अपवादनी आ व्याख्याने आश्रयीने जे उत्सर्ग बने छे, तेना माटे कही शकाय के 🡺
उत्सर्ग ए मुख्य मोक्षमार्ग छे..
उत्सर्गनी ज रुचि राखवानी..
शक्य होय, त्यां सुधी उत्सर्ग ज आचरवानो..
अपवाद आचरवो पडे, तो पण लक्ष्य उत्सर्गनुं राखवानुं..
आवां बधां विधानो, आ प्रकारना उत्सर्ग माटे ज छे.
जे व्याख्याओ अपेक्षीने समितिने के एकासणाने अपवाद कह्यो छे, ते व्याख्या मुजब जे उत्सर्ग बने छे (उपवास के शुभाशुभ उभयथी निवृत्ति रूप गुप्ति), तेने आ विधानो लागु ज पडतां नथी.
अने एटले ते उत्सर्ग मुख्य मोक्षमार्ग होवानुं कही शकातुं नथी.
एटले शुभ प्रवृत्ति रूप समिति पण मुख्य मोक्षमार्ग ज छे; कारणके सानुकूळ संयोगोमां आचरवानुं होय, ते उत्सर्ग – एवी व्याख्या तेने पण लागु पडे छे.
साधुनुं शरीर-सामर्थ्य होय तो विहार करवो – ए ज उत्सर्ग छे. एक स्थानमां १ महिनाथी वधु रहेवुं – ते तो अपवाद छे, शरीर-सामर्थ्य वगेरे न होवा रूप प्रतिकूळ संयोगोमां ज आचरवानुं छे.
जो विहार उत्सर्ग होय, तो शुभ प्रवृत्तिने अपवाद केम कहेवाय ? विहार, प्रवृत्तिरूप ज छे.
विहार आवे, त्यां इर्यासमिति आववानी ज. जो विहार उत्सर्ग होय, तो इर्यासमितिने अपवाद केम कहेवाय ?
पांच प्रहरनो स्वाध्याय ए उत्सर्ग छे. साधुए स्वाध्याय घोषपूर्वक-बोलीने करवानो छे. वचननी प्रवृत्ति पण त्यां छे ज. जो स्वाध्याय उत्सर्ग होय, तो शुभ प्रवृत्तिने अपवाद केम कहेवाय ?
बोलवानुं आवे, त्यां भाषासमिति आववानी ज.
जो बोलीने करातो स्वाध्याय उत्सर्ग छे, तो भाषासमितिने अपवाद केम कहेवाय?
आ रीते, बधी समिति – शुभ प्रवृत्ति माटे समजवानुं छे.
आवुं शास्त्रनुं तात्पर्य समज्या न होवाथी ज, कारणिको विधिः अपवादः एवी व्याख्याने लइने अपवाद रूप बनती समितिने मुख्य मोक्षमार्ग न मानवानो भ्रम, क्रियाविरोधी एकांत निश्चयवादीओने थयो छे, अने फेलावाय छे.
जो समितिने अपवादरूप मनाय, तो महाव्रतो पण अपवादरूप बनशे; कारणके उपरोक्त शास्त्रवचन, महाव्रतने समिति-गुप्तिरूप ज बतावे छे !
एटले एकांतवादीओए फेलावेल भ्रमजाळमां फसाइने, शुभ प्रवृत्तिने छोडवानी गंभीर भूल करवा जेवी नथी.
समिति कारणिक विधि होवानुं तात्पर्य आ छे 🡺
साधु निरर्थक हरफर न करे. आवश्यक प्रयोजने ज चाले. त्यारे ज इर्यासमिति होय. ए आवश्यक प्रयोजन, विहारादिवत् (सानुकूळ द्रव्य-क्षेत्रादिमां आचरण करवा रूप) उत्सर्ग पण होइ शके, अने तो इर्यासमिति पण तेवो उत्सर्ग ज बने.
साधु निष्प्रयोजन बोले नहीं. प्रयोजन होय, तो ज बोले. त्यारे ज भाषासमिति होय. ए प्रयोजन, स्वाध्यायादि (सानुकूळ द्रव्य-क्षेत्रादिमां आचरवा रूप) उत्सर्ग पण होइ शके, अने तो भाषासमिति पण तेवो उत्सर्ग ज बने.
साधु कोइ वस्तु निष्कारण ले नहीं. प्रयोजन होय, तो ज ले. त्यारे ज एषणासमिति होय. ए प्रयोजन, (सानुकूळ द्रव्यादिमां आचरवा रूप) उत्सर्ग पण होइ शके, जेम के पात्रा लेवा. त्यारे एषणासमिति पण तेवो उत्सर्ग ज बने.
साधु उपकरणने निष्कारण ले-मूक करे नहीं. प्रयोजन होय तो ज करे. त्यारे ज आदानभंडमत्तनिक्षेपणा समिति होय. ते प्रयोजन, (सानुकूळ द्रव्यादिमां आचरवा रूप) उत्सर्ग पण होइ शके, जेम के विहार करवा माटे दांडो लेवो. त्यारे आदानभंडमत्तनिक्षेपणा समिति पण तेवो उत्सर्ग ज बने.
साधु निष्कारण कोइ उपकरणादि वस्तु त्यागे नहीं. प्रयोजन होय तो ज त्यागे. त्यारे ज पारिष्ठापनिका समिति होय. ते प्रयोजन (सानुकूळ द्रव्यादिमां आचरवा रूप) उत्सर्ग पण होइ शके, जेम के मृत साधुना शरीरनो त्याग. त्यारे पारिष्ठापनिका समिति पण उत्सर्ग ज बने.
हकीकतमां एम कहेवामां जराय अतिशयोक्ति नथी के आपणा माटे समिति ज मुख्य मोक्षमार्ग छे. समिति रहित गुप्ति, प्रायः असंभवित छे.
वचन-कायानी शुभ प्रवृत्तिना आलंबन विना मनने शुभमां जोडी राखवुं अति दुष्कर छे.
एटले आपणे पुरुषार्थ, समितिमां ज करवानो छे.
गुप्ति तो समिति आववाथी आवी ज जवानी छे – समिओ नियमा गुत्तो ।
Article written by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.

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