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समिति–गुप्ति...

  • Jul 6
  • 5 min read
An illustration explaining the different perspectives of Naya in Jainism as taught by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.


  • समितिगुप्तीनां महाव्रतरूपत्वेन.. (उपदेश पद – ६०२ टीका)

प्रश्न : महाव्रतो मूळगुण रूप छे, समिति-गुप्ति तो उत्तरगुणरूप छे. तो समिति-गुप्तिने महाव्रतरूप शी रीते

कहेवाय ?

उत्तर : आनुं समाधान आवुं संभवे छे 🡺

महाव्रतो बधा अभाव रूप छे – त्याग रूप छे..

हिंसानो त्याग, मृषानो त्याग.. यावत् परिग्रहनो त्याग.

त्यागनी परिणति होई शके. अने ए परिणति ज महाव्रत छे – मन-वचन-कायाथी हिंसादि करवा-कराववा-

अनुमोदवा

नहीं. त्यागनी प्रवृत्ति शुं होय ? 

पासे होय, ते परिग्रह छोडी देवा रूप प्रवृत्ति एकादवार थाय, यावज्जीव शुं थाय ?

कशुं नहीं.

पण, जेनो त्याग कर्यो छे, ते अनाभोगादिथी पण न थइ जाय, तेना माटे प्रवृत्ति थइ शके. ते बधी उत्तरगुणरूप ज

छे,

जेम के चतुर्थव्रतनी नव वाड.

एटले, परिणतिरूप महाव्रतोने क्रियामां उतारवा, उत्तरगुणोनुं ज आचरण करवानुं होय छे.

एटले ज उत्तरगुणोना आचरणमां वारंवार शिथिलता, ए मूळगुणनी हानिनुं कारण बतावेलुं छे. (उपदेशमाळा)

एटले ज अहीं समिति-गुप्तिने महाव्रतरूप कही छे.

  • वस्तुतः महाव्रत ए परिणति छे – निश्चय छे.

    समिति-गुप्ति ए आचार छे – व्यवहार छे.

    व्यवहार-निश्चय परस्पर पर अवलंबित छे.. बंने एकबीजाना कारण पण छे, कार्य पण छे.. एकबीजाने पुष्ट करनारा छे.. एटले कथंचिद् एकरूप छे.

    एटले, समिति-गुप्तिनी उपेक्षा, ए महाव्रत-परिणतिना अभावनी द्योतक छे.

    समिति-गुप्तिनी दृढता, महाव्रत-परिणति होवानी दृढ संभावनानी द्योतक छे.


समिओ नियमा गुत्तो...

  • गुप्ति = अशुभ प्रवृत्तिथी निवृत्ति.

    एमां बे संभावना छे.

    1. शुभ प्रवृत्ति होय.

    2. शुभ प्रवृत्ति न होय.

  • बीजी संभावनाने आश्रयीने, शुभाशुभ उभय प्रवृत्तिथी निवृत्तिने गुप्ति कहेवाइ छे; पण त्यां ए समजवानुं छे के ते एक पेटाभेद छे. तेमां गुप्ति तो अशुभथी निवृत्ति रूप अंश ज छे. शुभथी निवृत्ति रूप अंश गुप्ति नथी; कारणके शुभमां प्रवृत्ति होय त्यारे पण गुप्ति तो होय ज छे.

    (जेम के मनुष्यने जीव कहेवाय, ते आत्मांशने लइने ज छे, मनुष्यांशने लइने नहीं; कारणके जीव तो मनुष्य न होय, तेवा देवादिने पण कहेवाय ज छे.)

    आवा सीधासादा तात्पर्यने एकांत निश्चयवादी क्रियाविरोधीओ पकडी शकता नथी, अने एटले, बीजा प्रकारनी गुप्तिना शास्त्रपाठो बतावीने शुभ क्रियाना त्यागनो उपदेश करे छे.

  • पहेली संभावनामां शुभ प्रवृत्ति पण होय छे, अर्थात् समिति पण होय छे.

  • समिति = शुभमां प्रवृत्ति.

    शुभमां प्रवृत्ति होय, त्यारे अशुभथी निवृत्ति होय ज, कारणके शुभाशुभ बे प्रवृत्ति साथे न थाय.

    एटले ज कह्युं के समिओ नियमा गुत्तो.

  • गुत्तो समिअत्तणंमि भइयव्वो – आ विधान बीजा प्रकारनी गुप्ति वखते संभवे छे. एमां पण मुख्यतया वचन-कायाने आश्रयीने ज ए संभवे छे, कारणके मन तो प्रवृत्ति विनानुं कदी होतुं नथी.

    एटले, वचन-कायानी शुभ प्रवृत्ति न होय, त्यारे गुप्त छे, समित नथी – एवो तात्पर्यार्थ समजवानो छे.

    (पांचे समिति, वचन-कायानी प्रवृत्ति रूप ज छे. वचन-काया विना, मात्र मननी प्रवृत्तिथी कोइ समितिनुं पालन संभवित नथी.)

    व्यवहारमां, वचन-कायाथी प्रवृत्त माणसने ज प्रवृत्त कहेवाय छे. एने आश्रयीने ज आ विधान छे.

  • ज्यां मननी पण शुभ प्रवृत्ति न होय, तेवी गुप्ति तो मात्र मनोनिरोध पछी १४मा गुणस्थाने ज संभवे छे; कारणके १३मा गुणस्थान सुधी द्रव्यमन तो छे ज, एने आश्रयी मनोयोग पण छे ज.


उत्सर्ग-अपवाद

  • प्रश्न : गुप्ति ए उत्सर्ग छे, समिति ए अपवाद छे – आवुं शास्त्रविधान मळे छे. एनुं अर्थघटन ए ज ने के शुभ प्रवृत्ति आपवादिक छे ? अर्थात् मुख्य मोक्षमार्ग शुभाशुभ उभयथी निवृत्ति रूप गुप्ति ज छे ?

    उत्तर : अपवाद कोने कहेवाय ? कारणिको विधिः अपवादः – ए तेनी व्याख्या छे. कारण आवे, त्यारे करवानुं होय, ते अपवाद.

    ए व्याख्या मुजब तो उत्सर्ग उपवास छे.

    एकासणुं पण (कारणिक होवाथी) अपवाद छे. शास्त्रमां बतावेल छ कारणोमांनुं एक कारण होय, तो ज वापरवानुं छे. एटले शुं एम कहेवाय के मुख्य मोक्षमार्ग उपवास छे ? एकासणुं करनार केवली भगवंतो के जिनकल्पिको अपवादनो आशरो लइ रह्या छे ?

    याद रहे, केवली भगवंतनुं चारित्र निरतिचार छे – यथाख्यात छे. जिनकल्प निरपवाद यतिधर्म छे.

    तो तेओ द्वारा थता एकासणाने अपवाद शी रीते कहेवाय ?

    जो न कहेवाय, तो समितिने पण अपवाद न कहेवाय, कारणके जिनकल्पिको बधी ज समितिनुं पालन करे ज छे. केवली भगवंतो पण स्वोचित समितिओनुं पालन करे छे.

  • वस्तुतः उत्सर्ग-अपवादनी व्याख्याओमां विवक्षाभेदे भेद छे.

    सानुकूळ द्रव्य-क्षेत्रादिमां जे आचरवानुं होय, ते उत्सर्ग..

    प्रतिकूळ द्रव्य-क्षेत्रादिमां जे आचरवानुं होय, ते अपवाद..

    आवी व्याख्या उपदेश पद, उपदेश रहस्य वगेरेमां छे. एवो अपवाद जिनकल्पिको कदी आचरता नथी, प्रतिकूळ द्रव्य-क्षेत्रादिमां पण उत्सर्गने पकडी राखवानुं सत्त्व – मनोबळ अने सामर्थ्य तेओ धरावे छे.

    उत्सर्ग-अपवादनी आ व्याख्याने आश्रयीने जे उत्सर्ग बने छे, तेना माटे कही शकाय के 🡺 

    • उत्सर्ग ए मुख्य मोक्षमार्ग छे..

    • उत्सर्गनी ज रुचि राखवानी..

    • शक्य होय, त्यां सुधी उत्सर्ग ज आचरवानो..

    • अपवाद आचरवो पडे, तो पण लक्ष्य उत्सर्गनुं राखवानुं..

    आवां बधां विधानो, आ प्रकारना उत्सर्ग माटे ज छे.

    जे व्याख्याओ अपेक्षीने समितिने के एकासणाने अपवाद कह्यो छे, ते व्याख्या मुजब जे उत्सर्ग बने छे (उपवास के शुभाशुभ उभयथी निवृत्ति रूप गुप्ति), तेने आ विधानो लागु ज पडतां नथी.

    अने एटले ते उत्सर्ग मुख्य मोक्षमार्ग होवानुं कही शकातुं नथी.

    एटले शुभ प्रवृत्ति रूप समिति पण मुख्य मोक्षमार्ग ज छे; कारणके सानुकूळ संयोगोमां आचरवानुं होय, ते उत्सर्ग – एवी व्याख्या तेने पण लागु पडे छे.

  • साधुनुं शरीर-सामर्थ्य होय तो विहार करवो – ए ज उत्सर्ग छे. एक स्थानमां १ महिनाथी वधु रहेवुं – ते तो अपवाद छे, शरीर-सामर्थ्य वगेरे न होवा रूप प्रतिकूळ संयोगोमां ज आचरवानुं छे.

    जो विहार उत्सर्ग होय, तो शुभ प्रवृत्तिने अपवाद केम कहेवाय ? विहार, प्रवृत्तिरूप ज छे.

    विहार आवे, त्यां इर्यासमिति आववानी ज. जो विहार उत्सर्ग होय, तो इर्यासमितिने अपवाद केम कहेवाय ?

  • पांच प्रहरनो स्वाध्याय ए उत्सर्ग छे. साधुए स्वाध्याय घोषपूर्वक-बोलीने करवानो छे. वचननी प्रवृत्ति पण त्यां छे ज. जो स्वाध्याय उत्सर्ग होय, तो शुभ प्रवृत्तिने अपवाद केम कहेवाय ?

    बोलवानुं आवे, त्यां भाषासमिति आववानी ज.

    जो बोलीने करातो स्वाध्याय उत्सर्ग छे, तो भाषासमितिने अपवाद केम कहेवाय?

  • आ रीते, बधी समिति – शुभ प्रवृत्ति माटे समजवानुं छे.

    आवुं शास्त्रनुं तात्पर्य समज्या न होवाथी ज, कारणिको विधिः अपवादः एवी व्याख्याने लइने अपवाद रूप बनती समितिने मुख्य मोक्षमार्ग न मानवानो भ्रम, क्रियाविरोधी एकांत निश्चयवादीओने थयो छे, अने फेलावाय छे.

    जो समितिने अपवादरूप मनाय, तो महाव्रतो पण अपवादरूप बनशे; कारणके उपरोक्त शास्त्रवचन, महाव्रतने समिति-गुप्तिरूप ज बतावे छे !

  • एटले एकांतवादीओए फेलावेल भ्रमजाळमां फसाइने, शुभ प्रवृत्तिने छोडवानी गंभीर भूल करवा जेवी नथी.

  • समिति कारणिक विधि होवानुं तात्पर्य आ छे 🡺

    • साधु निरर्थक हरफर न करे. आवश्यक प्रयोजने ज चाले. त्यारे ज इर्यासमिति होय. ए आवश्यक प्रयोजन, विहारादिवत् (सानुकूळ द्रव्य-क्षेत्रादिमां आचरण करवा रूप) उत्सर्ग पण होइ शके, अने तो इर्यासमिति पण तेवो उत्सर्ग ज बने.

    • साधु निष्प्रयोजन बोले नहीं. प्रयोजन होय, तो ज बोले. त्यारे ज भाषासमिति होय. ए प्रयोजन, स्वाध्यायादि (सानुकूळ द्रव्य-क्षेत्रादिमां आचरवा रूप) उत्सर्ग पण होइ शके, अने तो भाषासमिति पण तेवो उत्सर्ग ज बने.

    • साधु कोइ वस्तु निष्कारण ले नहीं. प्रयोजन होय, तो ज ले. त्यारे ज एषणासमिति होय. ए प्रयोजन, (सानुकूळ द्रव्यादिमां आचरवा रूप) उत्सर्ग पण होइ शके, जेम के पात्रा लेवा. त्यारे एषणासमिति पण तेवो उत्सर्ग ज बने.

    • साधु उपकरणने निष्कारण ले-मूक करे नहीं. प्रयोजन होय तो ज करे. त्यारे ज आदानभंडमत्तनिक्षेपणा समिति होय. ते प्रयोजन, (सानुकूळ द्रव्यादिमां आचरवा रूप) उत्सर्ग पण होइ शके, जेम के विहार करवा माटे दांडो लेवो. त्यारे आदानभंडमत्तनिक्षेपणा समिति पण तेवो उत्सर्ग ज बने.

    • साधु निष्कारण कोइ उपकरणादि वस्तु त्यागे नहीं. प्रयोजन होय तो ज त्यागे. त्यारे ज पारिष्ठापनिका समिति होय. ते प्रयोजन (सानुकूळ द्रव्यादिमां आचरवा रूप) उत्सर्ग पण होइ शके, जेम के मृत साधुना शरीरनो त्याग. त्यारे पारिष्ठापनिका समिति पण उत्सर्ग ज बने.

  • हकीकतमां एम कहेवामां जराय अतिशयोक्ति नथी के आपणा माटे समिति ज मुख्य मोक्षमार्ग छे. समिति रहित गुप्ति, प्रायः असंभवित छे.

    वचन-कायानी शुभ प्रवृत्तिना आलंबन विना मनने शुभमां जोडी राखवुं अति दुष्कर छे.

    एटले आपणे पुरुषार्थ, समितिमां ज करवानो छे.

    गुप्ति तो समिति आववाथी आवी ज जवानी छे – समिओ नियमा गुत्तो ।




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