पदार्थ-वाक्यार्थ...
- Jun 8
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पदार्थ
पदोना समूहरूप वाक्यनो अर्थ, ते पदार्थ छे. पदार्थ ज्ञान थया पछी बे संभावना छे 🡺
1. वाक्यार्थज्ञान थाय छे.
2. वाक्यार्थज्ञान नथी थतुं.
वाक्यार्थज्ञान न थवानां बे कारण संभवे छे 🡺
1. जे पदार्थज्ञान थयुं छे, तेनी पक्कड छे, अभिनिवेश छे. एनाथी विरोधी वातने असत् ज मानी ले.
आ मिथ्यात्वीने थाय, मिथ्याज्ञान रूप छे.
2. जे पदार्थज्ञान थयुं छे, तेनाथी विरोधी वात जणावतां शास्त्रो भण्यो नथी, के तेनी उपस्थिति नथी, के तेवी
तर्कशक्ति नथी.
आमां पण बे संभावना छे 🡺
1. ‘कोइपण वात, नयविशेषथी होय छे; नयविशेषथी तेनाथी जुदी वात संभवी शके छे..
कोइपण विधि-निषेध, द्रव्य- क्षेत्रादि ने आश्रयीने होय; द्रव्य-क्षेत्रादि बदलाय, तो विधि-निषेध बदलाइ शके..’
आवी सामान्य समज संस्कार रूपे स्थिर थयेली होय.
आ स्याद्वाद-परिणति छे. एटले एने थतुं पदार्थज्ञान श्रुतज्ञान रूप छे.
एने वाक्यार्थज्ञान न थवानुं कारण, बुद्धिनी मंदता के अभ्यास-उपस्थितिना अभावरूप अनाभोग ज छे.
वाक्यार्थज्ञान न थवाथी, जे पदार्थज्ञान थयुं छे, तेने ज सत्य मानी लेवा रूप पक्षपात होय, पण स्याद्वाद-
परिणति संस्काररूपे पडी होवाथी पक्कड न होय. विरोधी वात कोइ उपस्थित करे, तो तरत ज
वाक्यार्थज्ञान थाय.
2. उपरोक्त स्याद्वाद-परिणति नथी, कारणके स्याद्वाद भण्यो नथी. तेवो संयोग नथी के क्षमता नथी के हजु
अभ्यासनी प्रारंभिक कक्षा छे. पण, गीतार्थ प्रत्ये समर्पण छे.
एटले, जे पदार्थज्ञान थयुं छे, तेने ज सत्य मानी लेवा रूप पक्षपात होय, पण गीतार्थ तेनी विरोधी वात करे, तो
तरत ज स्वीकारी ले.. (के नयविशेषथी अथवा जुदा द्रव्य-क्षेत्रादिमां जुदी वात होइ शके.)
अहीं साक्षात् स्याद्वाद-परिणति नथी, पण गीतार्थनी परतंत्रताना कारणे फळथी छे. एने थतुं पदार्थज्ञान पण
श्रुतज्ञान रूप छे.
वाक्यार्थ
विरोधी पदार्थनी उपस्थिति ते वाक्यार्थज्ञान छे.
वस्तुतः, वाक्यार्थज्ञान प्रश्नरूप छे, ज्ञानरूप नथी.
पण, ते महावाक्यार्थज्ञानमां परिणमवाने अभिमुख होवाथी (चिंता)ज्ञानरूप कहेवाय छे; जेम अपायमां परिणमती इहाने ज्ञानरूप कहेवाय छे.
वाक्यार्थ ए वस्तुतः ज्ञानरूप न होवाथी ज, पदार्थज्ञानने श्रुतज्ञानरूप कह्या पछी, सीधा महावाक्यार्थज्ञानने ज चिंताज्ञानरूप कह्युं छे.
वाक्यार्थ थया पछी बे संभावना छे 🡺
1. महावाक्यार्थज्ञान थाय छे.
2. महावाक्यार्थज्ञान नथी थतुं.
महावाक्यार्थज्ञान न थाय, त्यारे त्रण संभावना छे 🡺
1. पदार्थ-वाक्यार्थ परस्पर विरोधी जणावाथी, शास्त्रवचनोनी प्रमाणभूतता पर ज शंका थइ जाय छे.. यावत्
शास्त्रवचनो प्रमाणभूत नथी – एवो निर्णय करी ले छे. आ स्पष्टपणे मिथ्यात्व छे.
2. उपरोक्त स्याद्वाद-परिणति हृदयस्थ होवाथी, ‘जे पदार्थ अने वाक्यार्थ विरोधी जणाय छे, तेनी पाछळ कोइ
नयविशेष के जुदां जुदां द्रव्य-क्षेत्रादि कारणरूपे होवा ज जोइए.. मारो प्रज्ञापराध छे के ए नयविशेष के
द्रव्य-क्षेत्रादि शुं ? ते मने समजातुं नथी..’ आवुं विचारे छे.
अहीं, व्यक्तपणे महावाक्यार्थ नथी, पण ऐदंपर्यार्थ तो हृदयस्थ छे ज. एटले प्रगटपणे समन्वय न करी शकवा
छतां, ‘आनो कोइक समन्वय हशे ज..’ एवो अव्यक्त महावाक्यार्थ थाय छे.
3. स्याद्वाद-परिणति पण हृदयस्थ नथी (कारणके तेवा अभ्यासादि नथी).. अने शास्त्रवचनो प्रमाण होवामां
कोइ शंका पण नथी.. त्यारे, बे विरोधी पदार्थोमां सत्य शुं ? तेनो निर्णय करी शकतो नथी.. ‘ज्ञानी जाणे..’ एवी
रीते अधूरुं मूके छे. अहीं वास्तवमां ऐदंपर्यज्ञान नथी, पण ज्ञानी कहे, तो स्वीकारवा रूप परतंत्रता छे
महावाक्यार्थ
पदार्थ-वाक्यार्थनो नयविशेष के जुदां जुदां द्रव्य-क्षेत्रादिनी विवक्षाथी समन्वय – ते महावाक्यार्थ छे.
महावाक्यार्थज्ञान बे रीते थाय छे 🡺
1. उपरोक्त स्याद्वादपरिणति हृदयस्थ छे. एटले, वाक्यार्थज्ञान थया पछी, विरोधी वातोनो समन्वय विचारे छे.
अने प्रज्ञानी सूक्ष्मता पण होवाथी समन्वय शोधी काढे छे. एने स्याद्वाद-परिणति वधु दृढ थाय छे.
2. स्याद्वाद-परिणति हृदयस्थ नथी (कारणके अभ्यासादि नथी). पण, ज्ञानी तेने महावाक्यार्थ समजावे छे..
अथवा स्वयं ज प्रज्ञाना बळे महावाक्यार्थ स्फुरे छे. आ व्यक्ति स्याद्वाद-परिणतिने अभिमुख बने छे.
वारंवार, जुदा जुदा विषयोमां महावाक्यार्थज्ञान थाय, एटले स्याद्वाद-परिणति हृदयस्थ थाय छे.
जेने महावाक्यार्थ नथी थतो, तेनामां जो ज्ञानीनी परतंत्रता होय, तो फळथी महावाक्यार्थ छे ज.
एटले ज, शास्त्रमां ज्ञानीने परतंत्रने पण ज्ञानी जेटली ज निर्जरा कही छे.. बंनेने साथे ज मोक्षमां पहोंचनारा कह्या छे. (उपदेश रहस्य)
एटले ज, ‘ज्ञानी श्वासोच्छ्वासमां.. पंक्तिमां ज्ञानी कोण ?’ ना जवाबमां पू. जयघोषसू. म. ए लख्युं छे – संयमनी काळजीवाळो, ज्ञानीने परतंत्र होय ते पण ज्ञानी कहेवाय.
ऐदंपर्यार्थ
स्याद्वाद ए ज ऐदंपर्यार्थ छे.
शास्त्रमां ‘जिनाज्ञा ए ज सार..’ एवो ऐदंपर्यार्थ बताव्यो छे.
पण, चरणकरणानुयोगमां जिनाज्ञा एक ज छे – तह तह पयट्टियव्वं, जह जह रागद्दोसा लहुं विलिज्जंति..
णवि किंचि अणुन्नायं, पडिसिद्धं वा वि जिणवरिंदेहिं.. विधान, कोइ निश्चित जिनाज्ञा न होवानुं, स्याद्वाद ए ज जिनाज्ञा होवानुं जणावे छे.
कया द्रव्यादिमां कइ जिनाज्ञा ? तेनो निर्णय, तह तह पयट्टियव्वं.. रूप जिनाज्ञाथी ज थाय छे. एटले ‘राग-द्वेष घटवा जोइए’ ए ज जिनाज्ञा छे. अने तेनी प्रधानता (सारभूतता) ए ज ऐदंपर्यार्थ छे.
जेने स्याद्वाद-परिणति हृदयस्थ छे, तेने सदा ऐदंपर्यार्थनुं ज्ञान – भावनाज्ञान छे ज.
ज्यारे ज्यारे महावाक्यार्थज्ञान थाय, त्यारे ते उपयोग रूपे व्यक्त थाय छे, परिणति दृढ पण थाय छे.
जेने स्याद्वाद-परिणति हजु हृदयस्थ नथी, तेने महावाक्यार्थज्ञान थाय, ते स्याद्वाद-परिणतिनुं (ऐदंपर्यार्थज्ञाननुं) कारण बने छे. वारंवार महावाक्यार्थज्ञान थवाथी स्याद्वाद-परिणति हृदयस्थ थाय छे.
उपसंहार
सिद्धसेन दिवाकरसूरिजीना मते, जेनी स्याद्वाद-परिणति अने सूक्ष्मप्रज्ञा-अभ्यास एवा छे के सर्वत्र व्यक्त रूपे महावाक्यार्थ थाय, तेने ज भाव-सम्यक्त्व छे.
जेने स्याद्वाद-परिणति होवा छतां प्रज्ञादिना अभावे व्यक्त महावाक्यार्थ थतो नथी, तेने..
अने जेने अभ्यासादिना अभावे व्यक्त स्याद्वाद-परिणति न होवा छतां गीतार्थ-परतंत्रता छे, ज्ञानी पर श्रद्धा छे, तेने.. द्रव्य-सम्यक्त्व छे.
महो. यशोवि. म. ए उपदेश रहस्य, द्रव्य-गुण-पर्यायनो रास वगेरे ग्रंथोमां स्पष्टता करी छे के उपरोक्त द्रव्य-सम्यक्त्व पण, भाव-सम्यक्त्व जेटली ज निर्जरानुं कारण छे. अर्थात् ते पण चतुर्थ गुणस्थाननी प्राप्तिनुं कारण छे.
हरिभद्रसू. म. ए षोडशकादि ग्रंथोमां, अने महो. यशोवि. म. ए उपदेश-रहस्यादि ग्रंथोमां, जेने महावाक्यार्थ नथी थतो, तेवा पदार्थज्ञानने पण श्रुतज्ञान कह्युं छे, ते समकितीने बताव्युं छे, मिथ्यात्वीने तेनाथी भिन्न प्रकारनुं ज्ञान बताव्युं छे.
एटले महावाक्यार्थ ज्ञान न होय, तेने पण सम्यग्दर्शन होवुं शास्त्रकारोने संमत छे – एमां संदेह नथी.
ज्यां स्याद्वाद-परिणति के गीतार्थ-परतंत्रता छे, त्यां मोहनीयनो क्षयोपशम छे. महावाक्यार्थ न थवानुं कारण प्रज्ञापराध छे – सामग्री-संयोग के क्षमतानो अभाव छे. ते कोइ आध्यात्मिक अवगुण नथी के जे निर्जराने प्रतिबंधक बने.
मोहनीयनो क्षयोपशम ए ज आध्यात्मिक गुण छे.
हा, सूक्ष्म प्रज्ञा, श्रद्धाने निर्मळ करे छे. पण जेनी प्रज्ञा सूक्ष्म न ज होय, तेनी श्रद्धा तेवी निर्मळ न ज होय – तेवुं कही शकाय नहीं.
श्रीपाळ रास (१३मी ढाळ)मां महो. यशोवि. म. ए जे अनुभवथी सम्यक्त्व रूपी सूर्योदय जणाव्यो छे, ते भावनाज्ञान (ऐदंपर्यार्थज्ञान)थी थतां (सिद्धसेन दिवाकरसूरिजी कथित) भावसम्यक्त्व रूप ज जणाय छे.
पदार्थादि चार, प्रधानपणे चरणकरणानुयोगनां वचनोमां ज लागु पडे छे. कारणके त्यां विरोधी जणातां वचनोनो जुदां जुदां द्रव्य-क्षेत्रादिथी अवश्य समन्वय होय ज.
द्रव्यानुयोगनां वचनो, जिनवचन छे; जिनाज्ञा नथी. (कारणके तेमां हान-उपादान नथी.) एटले ‘जिनाज्ञा ए ज सार..’ एवुं ऐदंपर्य त्यां होतुं नथी.
वळी, विरोधी जणातां वचनोमां समन्वय होय ज – तेवुं जरूरी नथी. मतांतर पण होइ शके छे, जेमांथी सत्य कोइ एक ज होय छे.
जेम के, रत्नप्रभाथी सौधर्म देवलोकनुं अंतर, एक राज अने दोढ राज – एवा बे पाठ मळे छे. एनो समन्वय थइ शके नहीं, मतांतर ज मानवो पडे. ज्ञानी जाणे छे के ‘शुं सत्य छे ?’ आपणे जाणता नथी, तेथी मतांतर रूपे ऊभुं राखीए छीए, पण सत्य तो एक ज छे. एटले, तेमां महावाक्यार्थ संभवित ज नथी.
छतां केटलीकवार द्रव्यानुयोगनां वचनोमां नयविशेषथी समन्वय कराय छे, तेथी उपचरित रीते पदार्थादिनो संभव मानी शकाय.
पदार्थादि चार अर्थनी वात सौ प्रथम (प्रायः) हरिभद्रसू. म. ना उपदेशपद – षोडशक वगेरे ग्रंथोमां जोवा मळे छे.
उपदेशपदमां तेने प्रकारांतरे व्याख्यानविधि रूपे बताव्या छे. (मूळ व्याख्यान विधि सुत्तत्थो खलु पढमो.. रूप बताव्यो छे.)
तेनाथी प्राचीन ग्रंथोमां आ चार अर्थनी वात प्रायः जोवा मळती नथी.
आवश्यक निर्युक्ति, विशेषावश्यक भाष्य वगेरे प्राचीन ग्रंथोमां अनुयोगनुं विस्तृत वर्णन छे, छतां पदार्थादि चारनो उल्लेख नथी.
एटलुं ज नहीं, विशेषावश्यक भाष्यना टीकाकार मलधारी हेमचंद्रसू. म., हरिभद्रसू. म. ना पश्चाद्वर्ती होवा छतां, पदार्थादि चारनो उल्लेख करतां नथी.
ते एवुं मानवा प्रेरे छे के पदार्थादि चार, मूळे तो अन्य दर्शननी परिभाषा छे. (हरिभद्रसू. म. ए आवी घणी परिभाषानो उपयोग पोताना ग्रंथोमां कर्यो होवानुं सुप्रसिद्ध छे.)
मलधारी हेमचंद्रसू. म. वगेरेए, स्वगुरुपरंपरामां आ पदार्थादि चारनी परिभाषा प्रसिद्ध-प्रचलित न होवाथी, पोतानी टीकामां तेनो उल्लेख न कर्यो होय – तेवुं कल्पी शकाय छे.
प्रायः तो उपदेशपदना टीकाकार मुनिचंद्रसू. म. अने षोडशकना टीकाकार यशोभद्रसू. म. ने छोडीने, हरिभद्रसू. म. नी पछी महो. यशोवि. म. पूर्वे कोइए पदार्थादि चारनो उल्लेख करेलो जोवामां आव्यो नथी.
वस्तुतः, वाक्यार्थ-महावाक्यार्थ, संहितादि व्याख्यानविधिमां आवता चालना-प्रत्यवस्थानना नामांतर ज छे. एटले, ए एक नवी परिभाषा मात्र छे. उपदेश पद नी टीकामां तेवुं जणाव्युं पण छे ज.
Article written by P.P. Bhavyasundar Vijayji Maharaj Saheb.

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